केस-1-‘घर में शौचालय नहीं है। सुबह होते ही लोटा लेकर खेत या मैदान जाना पड़ता है। सुना था नगर पालिका शौचालय बनवा रही है। छह माह पहले आवेदन किया था। जांच करने वाले भी आए लेकिन आज तक अनुदान नहीं मिला। इससे शौचालय बनवाने की मंशा अधूरी रह गई।’ रामखेलावन कुशवाहा, कुशवाहा नगर, बांदा
केस-2- ‘नगर पालिका के अधिकारियों का कहना है कि पहले शौचालय बनवा लो फिर पैसा देंगे लेकिन हमारे पास इतनी पूंजी कहां कि शौचालय बनवा लें। आवेदन करने के बाद काफी भागदौड़ की। थक हारकर घर बैठ गए’। लल्लन निषाद, कंचन पुरवा, बांदा
बांदा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन को नगर पालिका ही पलीता लगा रही है। इसकी बानगी बांदा मुख्यालय की नगर पालिका है। यहां व्यक्तिगत शौचालयों के लिए आए 4272 आवेदन धूल खा रहे हैं। अब तक एक भी शौचालय का निर्माण नहीं हो सका। शासन के नियम-निर्देशों को दरकिनार कर आवेदकों से पहले अपनी जेब से शौचालय बनवाने को कहा जा रहा है। उसके बाद अनुदान दिया जाएगा। जबकि शासनादेश में कहा गया है कि लाभार्थी को पहले 30 फीसदी अनुदान देकर काम शुरू कराया जाए। शौचालय निर्माण पूरा होने पर शेष 70 फीसदी भी दे दिया जाए। सूखे से प्रभावित गरीबों के पास इतना पैसा नहीं है कि वह पहले शौचालय बनवा सकें।
पिछले अक्तूबर माह में स्वच्छ भारत मिशन योजना शुरू की गई है। व्यक्तिगत शौचालय बनवाने के लिए प्रति लाभार्थी आठ हजार रुपये अनुदान देने का प्रावधान है। इसमें 50 फीसदी केंद्रांश और 50 फीसदी राज्यांश शामिल है। अक्तूबर से अब तक बांदा में 4472 लोगों ने ऑनलाइन आवेदन किया। नगर पालिका ने जांच की, जिसमें 1352 आवेदक पात्र पाए गए। बजट के मुताबिक 852 आवेदकों को स्वीकृति दे गई लेकिन नगर पालिका ने आवेदकों से ये अड़ंगा अड़ा दिया कि पहले अपने पास से शौचालय बनवाओ। उसके बाद पैसा दिया जाएगा। जबकि योजना में दिशा निर्देश हैं कि स्वीकृत और सर्वे आदि होने के बाद 30 प्रतिशत अनुदान राशि आवेदक को दे दी जाए। निर्माण शुरू हो जाने पर और फाउंडेशन स्तर तक काम पूरा हो जाने पर शेष पैसा दे दिया जाए। ऐसा कहीं नहीं कहा गया कि आवेदक पहले अपनी जेब से शौचालय निर्माण कराए। बाद में अनुदान मिलेगा जिनके पास एक वक्त की रोटी के लाले हैं वह 16 हजार रुपये कहां से लाकर शौचालय बनवाएंगे? राज्य सरकार ने भी स्वच्छता मिशन में रुचि नहीं दिखाई। अभी तक प्रदेश से धेला भर बजट नहीं आया। केंद्र सरकार से करीब 16 लाख रुपये आए हैं। नगर पालिका के सफाई निरीक्षक हरिशंकर निरंजन ने बताया कि केंद्र का 844 लाभार्थियों के लिए 50 फीसदी पैसा आया है लेकिन आवेदकों द्वारा शौचालय न बनवाने से उनका भुगतान नहीं हो पा रहा है।
सार्वजनिक शौचालय अधूरे
बांदा। नगर क्षेत्र के श्मशान स्थलों पर सार्वजनिक शौचालय बनवाने की मंशा भी पूरी नहीं हो सकी। नगर पालिका ने 13वें व 14वें वित्त से पिछले साल 45.32 लाख रुपये की लागत से तीन सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण शुरू कराया था। इसमें हरदौली घाट, राजघाट और खाईंपार (झिन्नन घाट) में 10-10 सीटों के शौचालय का निर्माण कराया जा रहा है। आठ माह से शौचालयों में अभी तक सीटें तक नहीं बैठाई जा सकीं। शव का अंतिम संस्कार करने आने वाले परिजनों को दुश्वारियां झेलनी पड़ रही हैं।
‘व्यक्तिगत शौचालय कुल लागत 16 हजार रुपये है। इसमें 50 फीसदी नगर पालिका दे रही है। पहले पैसा देने में आवेदक इसे शराब व अन्य कामों में उड़ा देंगे। इसलिए पहले भुगतान नहीं किया जा सकता। आवेदकों से पहले शौचालय बनवाने के लिए कहा गया है। शौचालय बनवाकर उनके पास आएं और अनुदान का पैसा लें। अभी तक कोई आवेदक मानक पर खरा नहीं उतरा, इसलिए भुगतान नहीं किया गया।’
वीरेंद्र श्रीवास्तव, अधिशाषी अधिकारी, नगर पालिका बांदा