बांदा। आज 13 जून है। इतिहास के पन्नों में एक खास दिन। सन 1857 में इसी दिन बांदा की धरती से क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को खदेड़ दिया था। नवाब अली बहादुर सानी की हुकूमत कायम हो गई थी। चौतरफा मची मारकाट और लूटपाट को रोकने के लिए नवाब ने सत्ता संभालते ही एलान किया कि अब किसी का कत्ल, लूटपाट या राहजनी हरगिज न की जाए। जो ऐसा करेगा उसकी चल-अचल संपत्ति जब्त करके आग के हवाले कर दी जाएगी।
नवाब के इस एलान पर निम्नीपार स्थित अपने महल में रह रहे रनजोर सिंह दउवा ने उपद्रवियों और अजयगढ़ की फौज की मदद से बांदा में अपना राज कायम करने का एलान कर दिया लेकिन इससे पहले कि अजयगढ़ और नवाब की फौज आमने-सामने आएं, नवाब अली बहादुर ने सूझबूझ से काम लेते हुए रनजोर सिंह दउवा को बुलाया और समझाया कि इस वक्त उपद्रवियों का जोर है। वह हंगामा कर रहे हैं। बवाल खत्म होने दो फिर नाना साहब जो फैसला करेंगे हम दोनों मान लेंगे। दउवा मान गया और अजयगढ़ की फौज निम्नीपार के किले में वापस चली गई। नवाब अली बहादुर ने बांदा की हुकूमत संभालते ही आम एलान जारी किया कि किसी किस्म की हिंसा, लूटमार, राहजनी आदि न की जाए। जो भी किसी दूसरे की सीमा में घुसपैठ करेगा या उपद्रव मचाएगा उसके मकान और संपत्ति जब्त कर लिए जाएंगे और सारा सामान आग के हवाले कर दिया जाएगा।
22 वर्ष में संभाली सत्ता, गोहत्या पर लगाई रोक
बांदा। अंग्रेजों से सत्ता हथियाते वक्त नवाब अली बहादुर सानी की उम्र जून 1857 में मात्र 22 वर्ष की थी। इतिहासकारों के मुताबिक तत्कालीन कलेक्टर मेन ने बांदा छोड़ने के बाद लिखा था कि नवाब मैदानी खेलों और पुरुषोचित व्यायामों का हमेशा शौकीन रहा है। वह राइफल और पिस्तौल का अच्छा निशानेबाज और श्रेष्ठ साहसी घुड़सवार है। बेहद व्यक्तिगत कष्ट झेल सकता है। नवाब ने सत्ता संभालने के बाद अंग्रेजी सरकार के पुराने डिप्टी कलेक्टर मोहम्मद सरदार खां को बांदा का प्रबंधक बना दिया। गाय, बैल की हत्या पूरी तरह वर्जित कर दी। उन दिनों क्रांतिकारियों का जनाक्रोश अपनी चरम सीमा पर था। किसी भी सरकारी प्रतिष्ठान को वह सहन नहीं कर पा रहे थे। अंग्रेजों को खत्म कर हिंदुस्तानी परंपरा और व्यवस्था स्थापित करने की भावना थी। इतिहासकारों ने लिखा है कि यह विद्रोह नहीं बल्कि इंकलाब था।