भारतीय दाल अनुसंधान संस्थान बुंदेलखंड को दाल कटोरा के रूप में पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाएगा। साथ ही पशु पालन को बढ़ावा देने के लिए देश के चुनिंदा व प्रतिष्ठित संस्थानों से समझौता हुआ है। ये बातें कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कुलपति डा.एसएल गोस्वामी ने कहीं।
गुरुवार को पत्रकार वार्ता में कुलपति डा.गोस्वामी ने कहा कि बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र के पांच प्रमुख जिलों बांदा, हमीरपुर, ललितपुर, जालौन, महोबा में साढ़े सात करोड़ की लागत की तीन वर्षीय सीड-हप परियोजना स्वीकृत की है। इसके तहत आने वाले समय में मूंग, उर्द, अरहर, चना व मसूर आदि लहनी फसलों के लिए बीज उत्पादन होगा। पहले साल तीन हजार, दूसरे साल 4250 और तीसरे साल 5750 कुंतल बीज उत्पादन किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि अच्छे किस्म के बीज से दलहन के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। अखिल भारतीय समन्वित दलहन सुधार कार्यक्रम के तहत विश्वविद्यालय में प्रमुख दलहनी फसलों के अनेकों जर्मप्लाज्म का परीक्षण किया जा रहा है। कुलपति ने कहा कि यह गौरव की बात है कि भारतीय दलहन अनुसंधान केंद्र, कानपुर ने विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे शोध कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए यहां परिसर में दलहन अनुसंधान शोध केंद्र खोलने की संस्तुति की है।
वैज्ञानिक यहां क्षेत्र के अनुरूप दलहन वाली फसलों पर शोध करेंगे। केंद्र से यह 100 फीसदी वित्तपोषित है। विश्वविद्यालय ने पशुपालन में शोध के लिए देश की कई प्रतिष्ठित संस्थानों से समझौते किए हैं। केंद्रीय बकरी अनुसंधान केंद्र, मथुरा ने बकरी पर शोध के लिए एक केंद्र खोलने की स्वीकृति दी है। इससे बुंदेलखंड में बकरी पालन को बढ़ावा मिलेगा। शोध कार्यक्रम के लिए चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर ने झांसी, मऊरानीपुर, गुरसरांय, महोबा व मवई बुजुर्ग में 370 एकड़ जमीन का हस्तांतरण किया है। यहां बीज का उत्पादन होगा।
बांदा, हमीरपुर, ललितपुर, जालौन, झांसी व महोबा के छह कृषि विज्ञान केंद्र भी यहां से जोड़ दिए गए हैं। इन केंद्रों के तहत विश्वविद्यालय को 583 एकड़ भूमि भी मिली है। सरसो की फसल को लोकप्रिय बनाने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा सरसो अनुसंधान निदेशालय, सेवर (भरतपुर) राजस्थान से बीच मंगाकर परीक्षण को कुल 50 प्रथम पंक्ति प्रदर्शन कृषकों के यहां लगाए गए हैं।