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बुंदेलखंड में बढ़ रहीं हैं टीला ढहने से मौतों की घटनाएं

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बांदा। कच्चे मकानों को मिट्टी से रंग-रोगन करने की कवायद बुंदेलखंड में अक्सर जानलेवा साबित हो रही है। अधिकांश घटनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में हो रही हैं। राजस्व विभाग द्वारा जरूरतमंदों को खनन के लिए कोई स्थान तय न करना और कुछ अरसे पहले शासन द्वारा मिट्टी के खनन में रायल्टी खत्म करने से मिट्टी खनन में और तेजी आई है।
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टीला ढहने और इसमें जिंदा दफन होने की घटनाएं बुंदेलखंड में दिवाली, दशहरे के सीजन में ज्यादा होतीं हैं। एक सप्ताह पूर्व यहां टीला ढहने में एक किशोर की दबकर मौत हो गई थी और उसके चार साथी घायल हो गए थे। कच्चे मकानों की मरम्मत समेत और भी कई कार्यों में मिट्टी का इस्तेमाल होता है। इसका खनन खास तौर पर वहां ज्यादा होता है जहां की मिट्टी अच्छी श्रेणी की है। जिसमें रेत या कं कड़ नहीं है और रंग भी निखरा हुआ है। आमतौर पर गांव के बाहर नदी-नालों के किनारे मिट्टी की ऐसी खदानें ज्यादा होती हैं।
भारी मात्रा में खनन करने वाले लोग मशीनों का इस्तेमाल करते हैं। घरेलू इस्तेमाल के लिए महिलाएं, बच्चे या युवक फावड़े आदि से ही खोदते हैं। गहराई वाली मिट्टी ज्यादा उपयोगी होती है। इसी लालच में गुफानुमा खुदाई की जाती है। अंतत: यही गुफानुमा टीले ढह जाते हैं। पिछले हफ्ते 12 फरवरी को बदौसा थाना क्षेत्र के भदावल गांव में टीला ढहने की घटना में 16 वर्षीय नत्थू प्रसाद साहू की मौत हो गई थी। उसके साथ मौजूद चार अन्य किशोर मामूली घायल हो गए थे।
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