बांदा। राजस्थान की सरसों अब बुंदेलखंड में पैदा करने की कवायदें शुरू हो गई हैं। वैज्ञानिकों ने सरसों की दो उन्नति प्रजातियां विकसित की हैं। ये किस्में बुंदेलखंड की मिट्टी और वातावरण को रास आएंगी। सरसों अनुसंधान निदेशालय, सेवर (राजस्थान) और बांदा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के बीच इसकी तकनीक के आदान-प्रदान का करार हुआ है।
कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय बांदा के कुलपति डॉ. एसएल गोस्वामी ने ‘अमर उजाला’ को बताया कि कृषि के विकास व भरपूर उत्पादन के लिए स्वस्थ व उच्च गुणवत्ता युक्त बीज का अहम योगदान है। उन्होंने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय बांदा एवं सरसों अनुसंधान निदेशालय सेवर (भरतपुर-राजस्थान) के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को आयोजित सरसों के बीज व आदान प्रदान वितरण कार्यक्रम में दोनों का समझौता हुआ है।
राजस्थान से सरसों की दो प्रमुख प्रजातियां आरएच-406 और एनआरसीएचबी-101 विकसित की गई हैं। बुंदेलखंड के लिए ये बेहद उपयुक्त हैं। इन प्रजातियों से कम सिंचाई पर भी 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर फसल ली जा सकेगी। लागत कम आएगी और उत्पादन बेहतर होगा। बताया कि मंडल के चारों जिलों के 26 गांवों के किसानों का चयन किया जा रहा है।
प्रसार निदेशक प्रोफेसर एनके वाजपेयी ने बताया कि सेवर अनुसंधान केंद्र और कृषि विश्वविद्यालय बांदा के वैज्ञानिक किसानों का मार्गदर्शन करेंगे। उन्हें उचित तकनीकी सलाह देंगे। समय-समय पर फसलों की निगरानी भी करेंगे। प्रथम पंक्ति प्रदर्शन सफल रहा तो अगले वर्ष मंडल के इतने ही गांवों का और चयन किया जाएगा। पांच साल में प्रत्येक गांव तक यह तकनीक पहुंचाने का लक्ष्य है। सरसों के बाद अलसी की नई प्रजातियां ही विकसित की जा रही हैं। ये जल्द ही किसानों तक पहुंचाई जाएंगी।