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Banda News: 22 वर्ष की आयु में साधना कर बलराम बन गए अवधूत महाराज

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बबेरू (बांदा)। वर्ष 1923 में पं. रामनाथ के घर जन्मे कृष्ण दत्त उर्फ बलराम 22 वर्ष की अवस्था में घर छोड़कर चले गए और पास स्थित गड़रा नदी में खड़े होकर घोर तपस्या की। बाद में सिमौनी धाम के संत अवधूत महाराज के नाम से प्रसिद्ध हुए।
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अवधूत महाराज ने प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद ग्राम प्रधानी के चुनाव में भाग्य आजमाया। हार मिली तो घर छोड़कर रात में चित्रकूट स्थित ब्रह्मलीन परशुराम स्वामी जी के आश्रम में जाकर वस्त्र त्याग कर संत बनने की दीक्षा ली। कुछ दिन रुकने के बाद आश्रम से खड़ाऊ और कमंडल लेकर चले गए। वृंदावन में भी कुछ दिनों तक साधना की। वहां से फिर आश्रम लौटे। देव पुरुष श्याम मौनी के नाम से प्रख्यात सिमौनी धाम से कुछ दूर से निकली गड़रा नदी में भीषण ठंड में सूर्याेदय के पूर्व गले तक पानी में खड़े होकर तपस्या करते थे। गर्मियों में तपती धूप में बालू में पड़े रहकर शारीरिक वासनाओं को जला डाला।

हनुमान जी की प्रेरणा से शुरू किया भंडारा
स्वामीजी का दावा था कि वर्ष 1967 में हनुमान जी ने स्वप्न में आदेश दिया कि भंडारा करो तभी से मौनी बाबा की समाधि स्थल पर प्रथम भंडारा छोटे रूप में शुरू किया गया। इसके बाद स्वामीजी ने उज्जैन ूंक्षिप्रा नदी के किनारे आश्रम बनाकर तपस्या की। यहां पांच वर्ष रहे। दिल्ली के घड़ौली में अवधूत आश्रम बनाकर भक्तों सहित रहकर तप साधना में लीन हो गए। हर वर्ष बबेरू तहसील के सिमौनी आश्रम पर 15 से 17 दिसंबर तक मेला व भंडारे का आयोजन होता है। इसमें लाखें की तादाद में श्रद्धालु पहुंचते हैं और बाबा का आशीर्वाद प्राप्त कर भंडारे में प्रसाद ग्रहण करते हैं।
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51 वर्षों से चल रहा अखंड संकीर्तन
हनुमान जी के परम उपासक बलराम अवधूत महाराज द्वारा जहां सिमौनी धाम में हर साल विशाल भंडारा कराया जाता है। वही वर्ष 1969 में अखंड राम नाम संकीर्तन की शुरुआत कराई जो लगातार आज भी जारी है। यहा उनके गुरु मौनी बाबा की समाधि आस्था का केन्द्र है यहा शंकर जी की 85 फीट ऊची और हनुमान जी की 110 फीट लेटी प्रतिमा के साथ गणेश व नंदी की मूर्ति आस्था का केंद्र है।
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