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बांदा: बकस्वाहा जंगल की जंग में जनप्रतिधि भी कूदे

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बांदा। बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल के दो लाख से ज्यादा पेड़ों को कटने से बचाने के लिए अब जनप्रतिनिधि भी सामने आने लगे हैं। पर्यावरण प्रेमी जहां आंदोलन और एनजीटी में रिट की मदद ले रहे हैं, वहीं मध्य प्रदेश विधानसभा के चार विधायकों ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर हीरा खनन परियोजना पर पुनर्विचार का अनुरोध किया है। इन विधायकों में सत्तारूढ़ दल भाजपा के भी हैं।
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महाराजपुर (छतरपुर) नीरज विनोद दीक्षित ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे पत्र में कहा कि बिड़ला समूह के हीरा प्रोजेक्ट से 2,15,875 पेड़ कटना प्रस्तावित है। इन दिनों जहां सोना, चांदी व हीरा बेंचकर आक्सीजन खरीदी जा रही है तो दूसरी तरफ आक्सीजन देने वाले वृक्षों की बलि देकर हीरा निकाले जा रहे हैं। जब मानव जीवन नहीं होगा तो हीरे कौन खरीदेगा। केंद्र और राज्य सरकार इस पर पुनर्विचार करें। बिजावर (छतरपुर) क्षेत्र के विधायक राजेश शुक्ला बबलू भइया ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भेजे पत्र में कहा कि यहां के वन उपज से ही आजीविका चलाते हैं। वन नहीं होंगे तो भरण पोषण की समस्या आ जाएगी। पीढ़ी बचाने के लिए वृक्षों की रक्षा की जाए।
आगर (मालवा, मध्यप्रदेश) के विधायक विपिन वानखेड़े और विधायक तथा एम्स, नई दिल्ली के पूर्व सहायक प्रोफेसर डा. हिरालाल अलावा ने प्रधानमंत्री मोदी को भेजे पत्र मेें कहा कि दो लाख से ज्यादा पेड़ों में 40 हजार सागौन के हैं। इन्हें कटने से यहां निवास करने वालों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। यह मानव समुदाय के लिए त्रासदी से कम नहीं होगा। विधायक ने सुप्रीम कोर्ट की विशेष समिति के हवाले से कहा कि एक पेड़ की कीमत एक करोड़ से अधिक होती है। विधायक ने बकस्वाहा हीरा खनन परियोजना रद्द करने की मांग की है।
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पर्यावरण प्रेमियों की मेहनत रंग लाने लगी
बकस्वाहा के जंगल के दो लाख से ज्यादा हरे-भरे पेड़ बचाने के लिए पर्यावरण प्रेमियों की मेहनत अब रंग लाने लगी है। जंगल को बचाने के लिए पर्यावरण प्रेमी, जनप्रतिनिधि और कई संगठन विरोध मेें उतर आए हैं। चिपको आंदोलन का भी एलान कर रखा है। बकस्वाहा जंगल में रोजाना इसे बचाने की गतिविधियां जारी हैं। अब तो यह मुद्दा एनजीटी तक पहुंच गया है।
पर्यावरण प्रेमी भर रहे हुंकार
बुंदेलखंड के हरेभरे बकस्वाहा के जंगल को बचाने के लिए देश के अधिकांश हिस्सों से पर्यावरण प्रेमी हुंकार भर रहे हैं। यहां जंगल में आए दिन विरोध की गतिविधियां भी जारी हैं। वेबिनार के जरिए भी सेव बकस्वाहा फारेस्ट मुहिम काफी तेजी से चलाई जा रही है। इसमें अब तक एक लाख से ज्यादा पर्यावरण प्रेमी जुड़ भी चुके हैं। बकस्वाहा जंगल को बचाने के लिए सोशल मीडिया का भी भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश-मध्यप्रदेश के बुंदेली एकजुट
बुंदेलखंड की हरियाली बचाने के लिए उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश दोनों ही सूबे के बुंदेली बाशिंदे जद्दोजहद में जुटे हुए हैं। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड से बुंदेलखंड राष्ट्र समिति, बुंदेली समाज महोबा, बुंदेलखंड नवनिर्माण सेना के विनय तिवारी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र और पर्यावरण कार्यकर्ता रामबाबू तिवारी, वाइस आफ बुंदेलखंड आदि इसमें पूरी तरह से शामिल हैं। उधर, पर्यावरण के पैरोकार बांदा के आशीष सागर दीक्षित भी बकस्वाहा सहित बुंदेलखंड के जंगलों और पेड़ों को बचाने के लिए लोगों को जागरूक करने में जुटे हुए हैं।
18 जून को साइकिल से दिल्ली के लिए कूच
बकस्वाहा जंगल बचाने की गूंज आने वाले दिनों में संसद की दहलीज तक पहुंच सकती है। पर्यावरण प्रेमियों ने इसकी तैयारी कर ली है। बांदा के बबेरू क्षेत्र निवासी बुंदेलखंड राष्ट्र समिति के कार्यकर्ता डालचंद्र मिश्रा ने घोषणा की कि वह 18 जून से दिल्ली तक साइकिल यात्रा शुरू करेंगे। उन्होंने पर्यावरण प्रेमियों का आह्वान संसद घेरने के लिए किया गया है।
15 गांव के आदिवासियों पर लटकी तलवार
बकस्वाहा जंगल में लगभग 15 गांव आबाद हैं। इन गांवों में ज्यादातर आदिवासी लोग ही निवास करते हैं। इन आदिवासियों की आजीविका जंगल पर ही निर्भर है। हीरा खदान के लिए जंगल का सफाया होने से सैकड़ों आदिवासी परिवारों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट आ खड़ा होगा।
50 साल में 55 हजार करोड़ के हीरों का खनन
जानकारी बताते हैं कि बकस्वाहा जंगल में माइनिंग कंपनी को 50 साल तक हीरा खनन का पट्टा मिला है। इसकी मंजूरी वर्ष 2019 में ही दी जा चुकी है। मध्य प्रदेश सरकार की अनुमति के बाद अब केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की हाई पावर कमेटी की भी हरी झंडी मिलना जरूरी है। यहां खनन में कंपनी को लगभग 55 हजार करोड़ कीमत के हीरे मिलने के आसार बताए जा रहे हैं।
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