बुंदेलखंड में खेती की दुश्मन बन चुकी अन्ना प्रथा को रोकने लिए जागरूकता पैदा करने का अभियान चला। इस अभियान से लोगों में जागरूकता तो नहीं आई लेकिन दो करोड़ रुपये जरूर खर्च हो गए। यह मर्ज घटने के बजाए और बढ़ गया है। इसके लिए धन बुंदेलखंड पैकेज से मिला था।
एक-डेढ़ दशक पहले तक अन्ना गायों की समस्या इतनी गंभीर नहीं थी। खेती बारी ठीक-ठाक होने से किसान और पशुपालक इन्हें पालते थे। दूध के साथ गोबर को खाद में इस्तेमाल किया जाता था लेकिन इधर कई सालों से मौसम की मार ने बुंदेलखंड में खेती चौपट कर दी है। हालात ऐसे हैं कि किसानों को खुद पेट भरने के लाले हैं। ऐसे मेें पशुओं के लिए दाना-चारा कहां से लाएं ? पीने के पानी का भी संकट बेहद गंभीर है।
गर्मियों में अक्सर पशु प्यास से मर रहे हैं। पूर्व की यूपीए केंद्र सरकार ने बुंदेलखंड के लिए 7200 से ज्यादा करोड़ का पैकेज दिया था। इसमेें दो करोड़ रुपये अन्ना प्रथा के खिलाफ जागरूकता अभियान के लिए थे। पशुपालन विभाग ने यह भारा भरकम रकम इसी मद में ठिकाने लगा दी।
इस अभियान के तहत लोगों को समझाना था कि दूध न देने पर भी पशुओं को अन्ना न छोड़ें। उनको घर पर ही रखकर चारा और पानी का इंतजाम करें। ताकि यह जानवर किसानों की फसल न खा सकें। अन्ना प्रथा थमना तो दूर, कई गुना ज्यादा बढ़ गई। विशेष पैकेज में पशुओें से संबंधित योजनाओं और कामों के लिए 100 करोड़ रुपये दिए गए थे। यह पूरा धन खत्म हो गया, लेकिन बुंदेलखंड का पशुधन पनप नहीं पाया।