बांदा। सजदे तो सभी ने किए, तेरा नया अंदाज है, हुसैन
ने वो सजदा किया जिस पर खुदा को नाज है। यौमे आशूरा यानी 10वीं मोहर्रम को
मजलिसों में ऐसे ही शेर, मर्सिए और नोहा ख्वानी के बीच शहीदाने कर्बला को
शिद्दत से याद कर खिराजे अकीदत (श्रद्धांजलि) दी गई।
उधर, शहर के
डेढ़ सौ से ज्यादा इमामबाड़ों से उठीं ढाल सवारी और दो दर्जन से ज्यादा
ताजियों को केन नदी किनारे स्थित प्रतीकात्मक कर्बला मैदान में हजारों के
हुजूम के बीच दफना दिया गया। इसी के साथ यहां परंपरागत मनाया जाने वाला 10
दिवसीय मोहर्रम खत्म हो गया। बड़ी तादाद में लोगों ने रोजा रखा।
नवीं
की पूरी रात इमामबाड़ों में अलाव में आग का मातम और रस्मी ढोल-ताशों की
गूंज के बीच ढाल सवारियां निकाली गईं। छावनी, गूलरनाका, अमर टाकीज तिराहा,
मर्दन नाका, कुंजरहटी, रामा का इमामबाड़ा अलीगंज, खुटला, कालवनगंज आदि
इलाकों में रात भर हुजूम रहा।
जगह-जगह चाय और काफी के लंगर हुए।
कौमी एकता की बयार को बहाल रखते हुए हिंदू धर्मावलंबियों ने भी अलाव में आग
का मातम किया। ढाल सवारी उठाई और कई स्थानों पर चाय-काफी के लंगर किए।
बसपा नेता मुमताज अली के साथ दिनेश शुक्ला लाला, नत्थू तिवारी, बाबूलाल
गुप्ता आदि ने काफी बांटी।
शनिवार को 10वीं पर दोपहर बाद एक बार फिर
इमामबाड़े ढोल-ताशों से गूंज उठे। सभी इमामबाड़ों से ढाल सवारियां और
ताजिए केन नदी की तरफ रवाना हुए। पद्माकर चौराहा से बलखंडी नाका और यहां से
कटरा होते हुए क्योटरा केन नदी किनारे तक ढाल सवारियों के साथ भारी हुजूम
से पैर रखने की जगह नहीं बची।
ढाल सवारियों को प्रतीकात्मक कर्बला
में विसर्जित कर दफना दिया गया। ताजियों को नदी किनारे बनाए गए लगभग दो
दर्जन पानी भरे गड्ढों में सुपुर्दे-आब और सुपुर्दे-खाक किया गया।
उधर,
शिया इमामबाड़ों में मजलिसों का सिलसिला चलता रहा। शहीदाने कर्बला की शान
में शेर पढ़े गए-फिर आज हक के लिए जान फिदा करे कोई, वफा भी झूम उठे यूं
वफा करे कोई। नमाज चौदह सौ साल से है इंतजार में, हुसैन की तरह मुझे अदा
करे कोई।
आम चौराहे पर ताजिया जुलूस में भारी भीड़ रही। यहां मिलाप
भी हुआ। नगर भ्रमण के बाद प्रतीकात्मक कर्बला मैदान में ताजियों को दफन कर
दिया गया। हरदौली, पतवन, औगासी, सिमौनी, आलमपुर, तिलौसा, बछौंधा, कोर्रही
आदि गांवों में भी ताजिए निकाले गए। एसडीएम सुरेंद्र सिंह और सीओ यशवीर
सिंह शामिल रहे।
ओरन में नूरी मसजिद में मौलाना तुफैल अहमद कादिरी
ने कर्बला का वाक्या बयां किया। ताजिया जुलूस निकाला गया। डा. बाबू खां,
इमाम बक्श, हाजी अली हसन, मीर मोहम्मद, अफजल अली खां और बाकर अली आदि शामिल
रहे। चिल्ला में आधा दर्जन ताजियों का मिलाप हुआ और सुपुर्दे-आब किया गया।
सादीमदनपुर के ताजिए और ग्रामीण भी शामिल रहे।