अतिकुपोषित बच्चों के उपचार के लिए दिए जा रहे प्रशिक्षण में उपस्थित एएनएम।
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बांदा। गर्भ में पल रहे बच्चे में भी कुपोषण हो सकता है। अतिकुपोषित बच्चे में भूख कम हो जाती है। दवा से भूख बढ़ती है। यह बात शुक्रवार को आदर्श बजरंग इंटर कालेज में आयोजित एएनएम के एक दिवसीय प्रशिक्षण में बांदा सुपोषण कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉ. बीपी वर्मा ने कही।
प्रशिक्षण को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अतिकुपोषित (सैम) बच्चों के समुदाय आधारित चिकित्सीय प्रबंधन और उपचार किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था की पहचान करना जरूरी है। उन्होंने पहचान के तरीके भी बताए। नरैनी सीएचसी प्रभारी चिकित्सक व बाल रोग विशेषज्ञ डा. बीएस राजपूत ने अति कुपोषित बच्चों के इलाज दवा से करने के तरीके बताए।
बांदा सुपोषण कार्यक्रम पर काम कर रहे पीपीएमयू दिल्ली से आए जिला सलाहकार लेखचंद्र त्रिपाठी, अभ्युदय संस्थान की ममता पांडेय व देवेंद्र कुमार ने भी एएनएम को विभिन्न जानकारियां दीं।
डीएम हीरालाल ने कहा कि बांदा सुपोषण कार्यक्रम का उद्देश्य कुपोषित सभी बच्चों को कुपोषण के दायरे से बाहर लाकर उन्हें पुन: सेहतमंद बनाना है। कहा कि अतिकुपोषित बच्चों में बीमारियों का खतरा 10 गुना ज्यादा रहता है। यह जानलेवा भी हो सकती है। उपचार बेहद जरूरी है।
जिला कार्यक्रम अधिकारी एसके बघेल ने बताया कि कुपोषण दर में कमी लाने के लिए कई बिंदुओं पर काम करने की जरूरत है। इसमें एक बिंदु दवा भी है। अतिकुपोषित बच्चे की भूख मर जाती है। दवा से भूख पुन: जागती है और वह पोषण सत्र में पौष्टिकता वाले भोजन चाव से खाता है। तभी वह स्वस्थ होगा।