बांदा। मशहूर शायर अफजल (इलाहाबाद) के सम्मान में आयोजित मुशायरे में मुकामी शायरों ने कलामों से समां बांध दिया। ज्यादातर गजल गूंजती रहीं। मर्दन नाका में डा.इजहार खालिद के आवास पर आयोजित मुशायरे की शुरूआत शायर निश्तर बांदवी ने नात से की। गुलजार बांदवी ने पढ़ा- ‘मेरी खताओं का माना कोई हिसाब नहीं, तेरे करम का भी लेकिन कोई जवाब नहीं’। मेजबान डा.इजहार का शेर था- ‘जिसकी खातिर हमने खुद को ही मिटाकर रख दिया, बेवफा का उसने ही इल्जाम हम पर ही रख दिया।’ मुशायरे का संचालन कर रहे नजरे आलम ने सुनाया- ‘ले के जाती है कहां मौजे समंदर देखें, अपनी टूटी हुई कश्ती का मुकद्दर देखें।’
मुख्य अतिथि डिप्टी सीएमओ डा.संजय वासवानी ने गजल पढ़ी- ‘मोम कहता है मुझे तो फिर मेरा ये दर्द देख, बारिशों के मौसम में मैं कभी भीगा नहीं।’ अफजल इलाहाबादी ने शेरों से महफिल को गर्मा दिया। शेर पढ़ा- ‘जाने क्यों ये दुनिया जलने लगी है, गुर्बत जब पोशाक बनने लगती है, नफरत कितनी प्यारी लगती है अफजल, प्यार के सांचे में जब ढलने लगती है।’ मुशायरे की अध्यक्षता कर रहे खादिम बांदवी सहित सईद, डा.शरीफ आदि ने भी शेर सुनाए।