बांदा। समूचा देश मंगलवार को जब राष्ट्रीय प्रदूषण निवारण दिवस मना रहा होगा तो भी बुंदेलखंड में लगभग 345 स्टोन क्रेशर धूल और धुएं से प्रदूषण फैलाते रहेंगे। रसूख वालों के इन क्रेशरों में तमाम मानक ठेंगे पर हैं। यह क्रेशर सिर्फ पत्थर की धूल ही नहीं बल्कि मानकों की धज्जियां भी उड़ा रहे हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी पावर या पैसे के चक्कर मेें इन्हें क्लीन चिट देता रहता है। बांदा-झांसी नेशनल हाईवे के किनारे कबरई और मटौंध में तमाम क्रेशर मानकों को खुली चुनौती दे रहे हैं।
हाल ही में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, झांसी के क्षेत्रीय अधिकारी ने जनसूचना अधिकार अधिनियम के तहत प्रवास सोसायटी के आशीष सागर को सूचना उपलब्ध कराई थी। इसमें बताया है कि झांसी, महोबा, ललितपुर, जालौन, बांदा और चित्रकूट में कुल 345 स्टोन क्रेशर हैं। इनमें सिर्फ सात बंद हैं। इस सूचना में आंखों में धूल झोंकने जैसी बात यह शामिल है कि नेशनल हाईवे-76 महोबा मार्ग पर कोई भी स्टोन क्रेशर सड़क के किनारे नहीं है। अलबत्ता महोबा-झांसी मार्ग पर कुल चार क्रेशर हैं। यह भी बताया गया कि नेशनल हाईवे और हरित पट्टिका से तात्कालिक समय मेें बोर्ड के मानकों के मुताबिक ही क्रेशरों को एनओसी जारी की गई थी। मौजूदा मानक के मुताबिक स्टोन क्रेशर की नेशनल हाईवे के मध्य से न्यूनतम 500 मीटर दूरी होना चाहिए। साथ ही राष्ट्रीय संरक्षित वन क्षेत्र/सेंच्युरी पार्क/आर्चंड से तीन किलोमीटर दूर होनी चाहिए।
उपरोक्त सूचना से जाहिर है कि नेशनल हाईवे से क्रेशर की दूरी कम से कम 500 मीटर होनी चाहिए। जबकि बांदा, महोबा, चित्रकूट आदि जिलों में कई क्रेशर इन मानकों के विपरीत हैं। इनसे रात दिन उड़ रही धूल आसपास के लगभग एक किलोमीटर दायरे में खेतों और आबादी को भारी नुकसान पहुंचा रही है। खेत सफेद धूल से पट गए हैं। इस दायर में रहने वाले और पत्थरों की खदानों तथा क्रेशरों में काम करने वाले लोग सिलकोसिस बीमारी से जकड़ रहे हैं।
सबसे ज्यादा क्रेशर का प्रदूषण महोबा जिले में हैं। यहां डहर्रा, पथरा, पचपहरा, गुगौरा आदि गांवों के पास जीवन दूभर हो गया है। पेड़-पौधों को भारी नुकसान पहुंच रहा है। दूसरे नंबर पर चित्रकूट जिला है। शिवरामपुर के आसपास क्रेशर मंडी पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रही है।
मंडल में तीन लाख वाहन फैला रहे प्रदूषण
बांदा। चित्रकूटधाम मंडल में छोटे-बड़े वाहन भी खूब प्रदूषण फैला रहे हैं। इनकी तादाद लगभग तीन लाख का आंकड़ा पार कर गई है। बांदा जिले मेें 95,331, महोबा में 70,967, हमीरपुर में 61,657 और चित्रकूट में 48,434 छोटे-बड़े वाहनों से दिन रात निकल रहा धुआं फिजा में जहर घोल रहा है। डीजल और पेट्रोल के धुएं से श्वांस और आंखों के रोगी तेजी से बढ़ रहे हैं। यातायात पुलिस उप निरीक्षक चिरंजीव ने बताया कि 10 वर्ष पुराने वाहन में 4.5 प्रतिशत और नए वाहनों में 3.5 प्रतिशत कार्बन मोनो आक्साइड होना चाहिए। इसी तरह डीजल वाहन में प्रदूषण मानक 75 हर्टेज स्मोक यूनिट होना चाहिए।
मानक से ज्यादा है वाहनों में धुआं
बांदा। वाहनों का प्रदूषण नापकर प्रमाणपत्र जारी करने वाले प्रदूषण केंद्र (गायत्री नगर) संचालक जागेश्वर शुक्ला ने बताया कि अधिकांश वाहनों का धुआं मानक से ज्यादा पाया जा रहा है। डीजल वाहनों में 45 के बजाए 60 से 70 हर्टेज स्मोक यूनिट धुआं पाया जा रहा है। पेट्रोल का धुआं ज्यादा नुकसानदेह है। इसमें नाइट्रेट, सल्फर और लेड शामिल है। यह श्वांस आरै आंखों को प्रभावित करती है।