बांदा। जिले में यमुना, केन और बागै नदी के प्रवाह के बावजूद यहां की धरती और लोग पानी के प्यासे हैं। बरसात में यह नदियां बाढ़ से तबाही मचाती हैं। लगभग एक सैकड़ा गांव बाढ़ से प्रभावित होते हैं। आधा सैकड़ा गांवों में सबसे ज्यादा नुकसान होता है। उधर, केन और बागै नदी का उद्गम स्थल शुष्क पहाड़ी इलाका होने से गर्मियों में जलधारा पतली हो जाती है। प्रदूषण के चलते इनका पानी पीने काबिल नहीं रह जाता। प्रदूषण खत्म करने और सफाई संबंधी न कोई योजना बनी और न ही अभियान चलाया गया। रविवार को गंगा दशहरा है। इस दिन लोग नदियों में डुबकी लगा पुण्य कमाते हैं लेकिन प्रदूषित होती नदियां बीमारियां बांट रही हैं। गंगा की तर्ज पर इन नदियों को भी भागीरथ का इंतजार है।
यमुना नदी- दिल्ली, आगरा, मथुरा और हमीरपुर के गंदे नालों से प्रदूषित होने के बाद जिले की सीमा में प्रवेश करती है। जसपुरा क्षेत्र में हमीरपुर की सीमा से शुरू होकर लगभग 250 किलोमीटर का सफर पूरा कर इलाहाबाद (प्रयाग) संगम में गंगा नदी में समाहित होती है। नदी से आधा दर्जन लिफ्ट केनाल बनाई गईं हैं। हालांकि पंप व बिजली की खराबी से केनाल ज्यादा सफल नहीं हो पाईं। गर्मियों में नदी का पानी पीने काबिल नहीं रहता।
बांट रही बीमारियां-पौराणिक महत्व की यमुना नदी में लोग पुण्य कमाने को नहाने जाते हैं और ले आते हैं चर्म रोग व खुजली आदि की बीमारी। इछावर, चिल्ला, औगासी, मरका घाट समेत नदी किनारे गांवों में शवों का अंतिम संस्कार इसी नदी में किया जाता है।
केन नदी- सीमावर्ती मध्य प्रदेश के पन्ना-दमोह की घाटियों से निकली यह नदी बांदा शहर को पेयजल और सिंचाई के लिए ‘लाइफ लाइन’ मानी जाती है। घाटियों से 60 किलोमीटर का सफर पूरा कर यह नदी पन्ना जिले की सीमा से होकर यहां प्रवेश करती है। जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर प्रवाह के बाद चिल्ला कसबे में यमुना नदी में इसका संगम हो जाता है। जिले के कुल सिंचित क्षेत्रफल में 60 फीसदी सिंचाई केन नहर प्रणाली के जरिए होती है। बांदा शहर को 80 फीसदी जलापूर्ति इसी नदी से होती है। बरसात में नदी की बाढ़ लगभग आधा सैकड़ा गांवों की फसल जलमग्न कर देती है। 20 से 25 गांवों के मजरों में तमाम मकान भी जमींदोज हो जाते हैं।
कचरा और लावारिस लाशें फेंकी जा रहीं-शुष्क पहाड़ी इलाके से उद्गम स्थल होने की वजह से गर्मी के मौसम में इसमें नाममात्र को पानी बचता है। उसमें भी प्रदूषण दुश्मन बना है। नगर पालिका सफाई के बजाय शहर का कचरा नदी किनारे डालती है। उधर, पुलिस भी लावारिस लाशें नदी में फेंकने से नहीं चूकती। शहर समेत नदी किनारे गांवों में लाशों का अंतिम संस्कार इसके घाटों में किया जाता है।
बागै नदी- केन नदी से कम जल प्रवाह क्षमता की इस नदी का उद्गम स्थल भी सीमावर्ती मध्य प्रदेश के अजयगढ़ (पन्ना) की घाटी में कौहारी स्थित सारंग आश्रम है। कालिंजर, नरैनी, बदौसा होते हुए लगभग 90 किलोमीटर प्रवाह के बाद यह कमासिन-राजापुर क्षेत्र में यमुना में समा जाती है। लगभग दो दर्जन गांव बाढ़ से प्रभावित होते हैं। खासकर खरीफ की फसल जलमग्न होकर बर्बाद हो जाती है। कसबों व गांवों का कूड़ा-कचरा और अवैध खनन नदी के अस्तित्व के लिए खतरा बना है।
अवैध बालू खनन-अवैध बालू का खनन भी नदियों के अस्तित्व के लिए खतरा बना हुआ है। तीनों ही नदियों की विडंबना है कि इनके लिए कभी शासन-प्रशासन और स्वैच्छिक संगठनों ने सफाई की अभियान नहीं चलाया। फलस्वरूप लाइफ लाइन मानी जाने वाली ये नदियां अपने हाल पर आंसू बहा रही हैं। इनको इंतजार है एक भागीरथ की जो इनको पहले की तरह निर्मल और स्वच्छ बना सके।