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‘सुरक्षित’ रखे बिसरा को खा रहे चूहे-विषखापर

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शमीम अहमद
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बांदा। ‘सुरक्षित’ रखने के नाम पर बिसरा अभिलेखों में भले ही सुरक्षित हो पर देखने से इसकी कलई खुल जाती है। पोस्टमार्टम में शवों से निकाले जाने वाले शरीर के प्रमुख अंग (बिसरा) को छह तक सुरक्षित रखने का प्राविधान है लेकिन यहां कई-कई साल पुराने बिसरा सड़ांध फैलाए हुए हैं। कई तो ऐसे हैं, जिन्हें चूहे और बिषखापर अपना आहार बना चुके हैं और बना रहे हैं।
गौरतलब है कि संदिग्ध मौत पर अक्सर पोस्टमार्टम में डाक्टर मौत की वजह समझ नहीं पाते। ऐसे में शव के कुछ महत्वपूर्ण अंग निकालकर केमिकल भरे कांच के बर्तन (मर्तबान) में रख दिए जाते हैं। अभिलेखों में लिखा जाता है कि बिसरा ‘सुरक्षित’ रख लिया गया है। इसमें शरीर के कुछ प्रमुख अंग जैसे मस्तिष्क, हृदय, लीवर, आंत और भोजन की थैली शामिल हैं। कांच के जार में स्प्रिट और कुछ अंग केमिकल के साथ इसे भरकर रख दिया जाता है। यह नियम अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा था। हालांकि इसमें हाल में बदलाव किया गया है।
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अभी तक यहां पुलिस लाइन की पुरानी इमारत में स्थित एक कमरे में बिसरा रखे जाते रहे हैं। सैकड़ों की तादाद में रखे गए बिसरा बेहद बदहाल अवस्था में हैं। कहने को यह ‘सुरक्षित’ हैं लेकिन हैं बेहद असुरक्षित। कमरे के दरवाजे और खिड़की टूटी हुई हैं। चूहे और विषखापर घुसकर रोजाना कांच के जार में प्लास्टिक के लगे ढक्कन को काटकर बिसरा खा रहे हैं। दो कमरों में अब तक लगभग 10 हजार से ज्यादा बिसरा रखे हुए हैं।
कानून तौर पर बिसरा सुरक्षित रखने की अवधि छह माह है। न्यायालय के आदेश पर बिसरा को लखनऊ स्थित विधि विज्ञान प्रयोगशाला जांच के लिए भेजा जाता है। वहां से आने वाली रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल होती है। प्रयोगशाला से रिपोर्ट आने में तीन माह से लेकर अक्सर साल भर तक लग जाते हैं। साल में औसतन 20 से 25 बिसरा कोर्ट के आदेश पर जांच के लिए प्रयोगशाला भेजे जाते हैं। कांच के जिन जारों में बिसरा रखे गए हैं उन पर धूल की मोटी परत है।
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जार पर चिपकी स्लिप गलकर फट गई है या दीमक चुन गई है। इससे यह पता ही नहीं चलता है कि किस जार में किसका बिसरा है ? चूहे और विषखापर ढक्कन कुतर कर बिसरा को अपना निवाला बना रहे हैं।
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