लोकसभा चुनावों में यह शायद पहला मौका होगा जब चुनावों के चाणक्य कहे जाने वाले ब्राह्मण मतदाताओं पर यह इल्जाम नहीं लगेगा कि वे स्वजातीय को ही वोट देते हैं।
भारी भरकम जनसंख्या वाले ये मतदाता इस बार जातिगत दबावों की राजनीति से भी राहत महसूस करेंगे। हालांकि इसका मलाल लाजमी है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने उन्हें नजरअंदाज किया है।
लोकसभा चुनाव के इतिहास में बांदा-चित्रकूट संसदीय सीट पर ज्यादातर ब्राह्मण प्रत्याशी ही विजयी हुए हैं। वर्ष 1952 से 2014 तक का कोई लोकसभा चुनाव ऐसा नहीं रहा, जिसमें ब्राह्मण प्रत्याशी चुनाव मैदान में न रहे हों।
लेकिन इस लोकसभा चुनाव में इस पुराने रिकार्ड को तोड़ दिया गया है। सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस ने तो ब्राह्मण प्रत्याशियों को नजरअंदाज किया ही, भाजपा ने भी अबकी टिकट नहीं दिया।
निवर्तमान ब्राह्मण सांसद भैरो प्रसाद मिश्र का भी पत्ता साफ कर दिया। इसके बाद कुछ छोटे दलों और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में छह से ज्यादा ब्राह्मण वर्ग के लोगों ने नामांकन दाखिल करके अपनी भागीदारी और उपस्थिति बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन निर्वाचन विभाग के कायदे कानून की उन पर कैंची चल गई। उनके नामांकन पत्र विभिन्न खामियों के चलते खारिज कर दिए गए।
बांदा-चित्रकूट संसदीय सीट पर ब्राह्मण मतदाताओं की अनुमानित संख्या लगभग सवा दो लाख है। ऐसे में सभी प्रत्याशियों की इन पर नजर है। मतदाताओं का यह बड़ा तबका, जिस पर मेहरबान हो गया उसका पलड़ा भारी हो सकता है।
इसके लिए सबसे ज्यादा जोड़तोड़ और कोशिशें भाजपा कर रही है। सपा-बसपा गठबंधन भी उन पर डोरे डाल रहा है। कांग्रेस यह कहकर उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है कि ब्राह्मण मतदाता शुरुआती दौर से ही पार्टी के साथ रहा है।
उधर, इन सब तमाम जोड़तोड़ और कयासबाजियों के बीच फिलहाल ब्राह्मण मतदाता खामोशी अख्तियार किए है। मतदान नजदीक आने पर ही वे अपनी रणनीति तय करेंगे।
संसदीय क्षेत्र में मतदाता
ओबीसी 900000
एससी 420000
ब्राह्मण 230000
मुस्लिम 100000
कुल मतदाता 1666154