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110 साल का बरियारपुर बांध नहीं रहा भरोसे का

Tue, 10 May 2016 11:29 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बांदा
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बरियारपुर बांध। - फोटो : अमर उजाला
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बांदा। एक सौ दस साल पुराना बरियारपुर बांध अब भरोसे का नहीं रहा। तह पर भारी मात्रा में सिल्ट जम जाने से इसकी क्षमता भी 80 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) घट गई है। इसके स्थान पर नया बांध/बियर बनाने के लिए पिछले कई साल से लंबित प्रस्ताव की जांच पड़ताल केंद्रीय जल आयोग की टीम इसी माह 15 तारीख को करेगी।
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गंगऊ बांध की डाउन स्ट्रीम पर बने बरियारपुर बांध से मुख्य केन नहर निकली है।

बांदा जिले में लगभग 1100 किलोमीटर लंबी नहरों से सिंचाई इसी बांध के पानी से होती है। बरियारपुर बांध वर्ष 1906 में बना था। इसमेें केन नदी पर लगभग 650 मीटर लंबी बेहद मजबूत दीवार (क्रस्टवाल) खड़ी है। इसके अंदर सुरंगनुमा आरपार रास्ता है। दीवार के ऊपर 8 फिट लंबे, 8 फिट चौड़े और 8 फिट ऊंचे भारी भरकम लोहे के फाटक लगे हैं। इन्हीं को खड़ा करके पानी रोका जाता है। बारिश के मौसम में उफनाने वाले इस बांध की दीवार से लाखों क्यूसिक पानी रात-दिन भारी प्रेशर के साथ बहता है।

अब यह बांध काफी जर्जर हो गया है। सिंचाई विभाग मरम्मत के नाम पर हर साल इस पर लाखों रुपये खर्च करता है, पर हालत यह है कि बांध की तलहटी में भारी मात्रा में सिल्ट जमा हो चुकी है। इससे पानी भंडार की क्षमता में काफी कमी आई है। शुरू के दिनों में बरियारपुर बांध की क्षमता 450 एमसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) थी। अब यह घटकर 370 एमसीएम रह गई है। एक हकीकत यह भी है कि अगर सिल्ट न जमती और बांध में अपनी पूरी क्षमता का पानी भरता तो क्रस्टवाल अब तक धराशायी हो जाती।
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बरियारपुर बांध के स्थान पर नया बांध/बियर बनाने के लिए बसपा सरकार में तत्कालीन सिंचाई मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने पहल की थी। उनके निर्देश पर यहां के सिंचाई विभाग के अभियंताओं ने बांध की डाउन स्ट्रीम पर नया बियर बनाने के लिए प्रस्ताव भेजा था। इस पर काम भी शुरू हो गया था। मध्य प्रदेश इस पर अड़ंगा लगाता रहा था लेकिन यूपी की सरकार बदलने के साथ यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला गया। पिछले माह बांध सिंचाई प्रखंड तृतीय के अधिशासी अभियंता योगेश कुमार रावल ने बांध की हालत बयां करते हुए नए बांध के निर्माण के लिए केंद्रीय जल आयोग को पत्र भेजा था। इस पर आयोग 15 मई को अपनी टीम यहां भेज रहा है।

बुंदेलखंड में नहीं बनाए गए बैराज
बांदा। बुंदेलखंड के खेतों को पानी देने वाले बांधों के बारे मेें यूपी और एमपी की सरकारें संवेदनशील नहीं रहीं। वरना शायद ये हालात न होते। प्रदेश के तमाम बांधों और बड़ी नदियों में बैराज बन गए लेकिन बुंदेलखंड के बरियारपुर, गंगऊ और झांसी के पारीछा बियर में बैराज नहीं बने, जबकि पानी संकट को देखते हुए इन्हें बहुत पहले बन जाना चाहिए था। बैराज बन जाने से पानी के भंडार की क्षमता बढ़ती है। फाटक भी ज्यादा लंबे चौड़े होते हैं। पानी बर्बाद नहीं होता। फाटक खोलने बंद करने में दिक्कतें नहीं आतीं। मौजूदा बांधों में फाटक खड़े करने या गिराने के लिए कर्मचारी व मजदूरों को काम करना पड़ता है। इसमें समय ज्यादा लगने के साथ ही खतरा भी बना रहता है।
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