फोटो-2-बलरामपुर के तुलसीपुर में गेहूं भुजाती महिलाएं।-संवाद
तुलसीपुर। प्रसिद्ध शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर में आषाढ़ माह के साथ ही सदियों पुरानी गुड़-धनिया मेले की परंपरा शुरू हो गई है। फसल की कटाई के बाद और नई फसल की बोआई से पहले आयोजित होने वाला यह मेला आस्था, लोक संस्कृति और कृषि परंपरा की अनूठी छटा बिखेरता है।
मेले में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के साथ ही नेपाल और थारू बाहुल्य क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु परिवार सहित पूजन अर्चन के पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में श्रद्धालु पारंपरिक तरीके से मिट्टी का भार तैयार कर सामूहिक रूप से चना और गेहूं भूनकर उसमें गुड़ मिलाकर गुड़-धनिया का विशेष प्रसाद तैयार कर मां पाटेश्वरी को अर्पित करते हैं। इसके बाद भगवान शिव का जलाभिषेक कर सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना की जाती है।
नई फसल का पहला भोग मां पाटेश्वरी को अर्पित
मान्यता है कि नई गेहूं की फसल का पहला भोग माता रानी को अर्पित करने से धान की फसल अच्छी होती है और खेतों में भरपूर पैदावार होती है। श्रद्धालु रामनिवास ने बताया कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और किसानों की खेती-किसानी में बरकत का प्रतीक मानी जाती है। श्रद्धालु रेनू ने बताया कि गुड़-धनिया मेले में पूरा गांव एक साथ जुटता है। खुले आसमान के नीचे माता के भजनों के बीच प्रसाद तैयार करने का अपना अलग ही आनंद है, जिससे सामाजिक एकता और आपसी भाईचारा भी मजबूत होता है।
वर्षों पुरानी है गुड़-धनिया मेले की परंपरा
मंदिर की व्यवस्थाएं देख रहे अरुण गुप्ता ने बताया कि आषाढ़ माह में लगने वाले इस गुड़-धनिया मेले की परंपरा सैकड़ों वर्ष पुरानी है। प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार को भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस मौके पर नेपाल और थारू क्षेत्र से आने वाले भक्तों की सुविधा, सुरक्षा और सुचारु दर्शन-पूजन के लिए मंदिर प्रशासन की ओर से विशेष तौर पर इंतजाम सुनिश्चित कराए जाते हैं।
फोटो-2-बलरामपुर के तुलसीपुर में गेहूं भुजाती महिलाएं।-संवाद