सादुल्लाहनगर। क्षेत्र के फरेंदा खुर्द में रविवार को मिले दुर्लभ गिद्ध का इलाज फॉरेस्ट सेंटर में चल रहा है। सोमवार को उसकी हालत में कुछ सुधार है। गिद्ध के पंखों के पास अब भी जख्म है, जिसके कारण वह उड़ नहीं पा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि पंख के जख्म भरने में दो से तीन दिन का समय लग सकता है। जैसे ही वह उड़ने लगेगा, गिद्ध को जंगल व सुरक्षित छोड़ दिया जाएगा।
फरेंदा खुर्द में रविवार को खेतों के पास ग्रामीणों ने एक दुर्लभ काले गिद्ध को जमीन पर गिरा हुआ देखा। गिद्ध घायल था और उसके चारों ओर कौवों का झुंड लगातार हमला कर रहा था। ग्रामीणों ने कौवों को भगाकर गिद्ध की जान बचाई, लेकिन गिद्ध उड़ नहीं सका। गांव के ही रामजीलाल, रामकुमार और अन्य किसानों ने वन विभाग को सूचना दी थी।
वन रेंज की टीम के साथ वन दरोगा बहुश्रुत यादव गांव पहुंचे। टीम ने पहले आसपास के लोगों को सुरक्षित दूरी पर किया, फिर जाल की मदद से घायल गिद्ध को रेस्क्यू किया। गिद्ध के पंख पर चोट के गहरे निशान थे और वह बेहद कमजोर लग रहा था। वन दरोगा ने बताया कि यदि ग्रामीण समय रहते सूचना न देते, तो गिद्ध की जान बचाना मुश्किल हो जाता। यह बहुत ही दुर्लभ प्रजाति है और इसका संरक्षण हम सबकी जिम्मेदारी है।
फॉरेस्ट सेंटर में हो रहा इलाज
गिद्ध को प्राथमिक उपचार देने के बाद टीम ने उसके संपूर्ण इलाज के लिए विशेष वाहन से फॉरेस्ट सेंटर भेजा था। वहां वन चिकित्सक की देखरेख में उसका इलाज चल रहा है। रेंजर वीरेंद्र तिवारी ने बताया कि गिद्ध कहीं बाहर से यहां आया है। गिद्ध की उम्र करीब 14 वर्ष है। गिद्ध 25 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं। उन्होंने बताया कि रेस्कयू किया गया गिद्ध कौवों के हमले में बुरी तरह घायल हुआ है। उसके पंख के ऊपर और नीचे की तरफ गहरे जख्म हैं। एक घाव कुछ बेहतर है। उसके पूरी तरह ठीक होने तक इलाज किया जाएगा। पूरी तरह स्वस्थ होने पर इसे सुरक्षित जंगलों में छोड़ा जाएगा, ताकि यह प्राकृतिक माहौल में फिर से उड़ान भर सके। इसमें दो से चार दिन तक लग सकते हैं। रेंजर ने बताया कि यह गिद्ध झुंड में चलते हैं, अंदेशा है कि यह अपने झुंड से बिछड़ गया है। ऐसा ही एक गिद्ध रविवार को गोंडा के नवाबगंज में भी मिला है।
गिद्धों का संरक्षण बेहद जरूरीपूरे गांव में रेस्क्यू ऑपरेशन की चर्चा पूरे दिन रही। लोगों ने कहा कि आज के दौर में गिद्ध जैसी संकटग्रस्त प्रजाति को बचाना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह प्रकृति के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एमएलके पीजी कॉलेज के प्राणी विज्ञान के प्रोफेसर अशोक कुमार के अनुसार, दवाइयों में इस्तेमाल होने वाली कुछ रसायनयुक्त दवाओं और प्राकृतिक आवास कम होने की वजह से गिद्धों की संख्या तेजी से घटी है। यही कारण है कि ऐसे काले गिद्ध का मिलना किसी भी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनका संरक्षण बेहद जरूरी है।
पहले भी जिले में आ चुका है गिद्धों का झुंड
जिले की प्राकृतिक स्थिति ऐसी है कि यहां अक्सर गिद्धों का झुंड आता रहता है। बलरामपुर फर्स्ट के संयोजक सर्वेश सिंह ने बताया कि सुआंव नदी के आसपास गिद्ध दिखते हैं। वन विभाग की ओर से भी संरक्षण के प्रयास हो रहे हैं। रेंजर वीरेंद्र तिवारी ने बताया कि गिद्ध कहीं बाहर से यहां आया है। माना जा रहा है कि मौसम में बदलाव से यह घूमने निकले हैं।