फोटो-41-बलरामपुर में शहतूत की खेती का निरीक्षण करते अधिकारी।-स्रोत: विभाग
बलरामपुर। जिले की ग्रामीण महिलाओं के लिए रेशम उत्पादन रोजगार और आत्मनिर्भरता का नया जरिया बनने जा रहा है। मुख्यमंत्री रेशम विकास योजना के तहत स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को रेशम उत्पादन से जोड़ा जा रहा है। महिलाओं को प्रशिक्षण, शहतूत के पौधे और कीटपालन की जानकारी देकर स्वरोजगार के लिए तैयार किया जा रहा है। अब तक 100 महिलाओं को योजना से जोड़ा जा चुका है। वर्ष 2026-27 में 100 और महिलाओं को लाभ देने का लक्ष्य है। इससे कुल 200 महिलाएं रेशम उत्पादन से जुड़कर अपनी आय बढ़ा सकेंगी।
योजना के तहत रेशम उत्पादन की एक परियोजना की लागत करीब 1.75 लाख रुपये निर्धारित है। इसमें 70 प्रतिशत अनुदान विभाग की ओर से दिया जाता है। लाभार्थियों को रेशम उत्पादन की तकनीक, शहतूत की खेती और रेशम के कीटपालन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे महिलाएं खेती के साथ अतिरिक्त रोजगार भी हासिल कर सकेंगी।
आधा एकड़ में लगेंगे 600 शहतूत के पौधे
रेशम उत्पादन के लिए लाभार्थी के पास कम से कम आधा एकड़ जमीन होना जरूरी है। आधा एकड़ में 600 और एक एकड़ में 1,200 शहतूत के पौधे लगाए जाते हैं। शहतूत की पत्तियों पर रेशम के कीटों का पालन कर कोकून तैयार किया जाता है। इसके बाद कोकून से रेशम का धागा तैयार होता है।
महिलाओं को मिलेगी अतिरिक्त आय
पूनम देवी ने बताया कि प्रशिक्षण और शहतूत के पौधे मिलने से रोजगार की नई उम्मीद जगी है। इससे घर बैठे आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी। रोशनी ने कहा कि खेती के अलावा आय का कोई साधन नहीं था। रेशम उत्पादन से जुड़कर आय बढ़ाने का अवसर मिलेगा। रेखा ने बताया कि प्रशिक्षण से कीटपालन और शहतूत की खेती की जानकारी मिली है। इससे आत्मनिर्भर बनने का भरोसा बढ़ा है।