लखनऊ। बलरामपुर के पचपेड़वा क्षेत्र में थारू समुदाय की 15 वर्षीय किशोरी से दुष्कर्म और गर्भपात कराने के मामले में स्थानीय पुलिस की विवेचना पर गंभीर सवाल उठे हैं। तत्कालीन विवेचक सीओ तुलसीपुर ने 57 दिन तक जांच की, जबकि तीन दिन बाद चार्जशीट दाखिल की जानी थी। इसके बावजूद कई अहम साक्ष्य जुटाए ही नहीं गए। हाईकोर्ट के आदेश पर एसटीएफ की जांच में स्थानीय पुलिस की कई गलतियां सामने आई हैं।
अप्रैल 2026 में दर्ज एफआईआर में जलाल अहमद पर दुष्कर्म और गर्भपात कराने का आरोप था। एससी/एसटी एक्ट भी लागू होने के कारण विवेचना सीओ स्तर के अधिकारी को सौंपी गई थी। एसटीएफ ने जांच पूरी कर जलाल अहमद, डॉक्टर दंपति, एक कंपाउंडर और पीड़िता की मां के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है।
एसटीएफ जांच में सामने आया कि स्थानीय पुलिस ने न तो सीसीटीवी फुटेज जुटाए, न आरोपियों की कॉल डिटेल खंगाली और न ही मेडिको-लीगल रिपोर्ट के महत्वपूर्ण तथ्यों का समुचित परीक्षण किया। डीएनए जांच नहीं हो पाने के पीछे भी विवेचना में लापरवाही सामने आई है।
कॉल डिटेल ने खोली कंपाउंडर की भूमिका
स्थानीय पुलिस ने जिस कंपाउंडर को गिरफ्तार किया था, उसकी कॉल डिटेल तक नहीं निकाली। एसटीएफ की जांच में सामने आया कि उसकी तीन-चार महीनों में आरोपी डॉक्टर सूफियान से करीब 900 बार बातचीत हुई थी। ड्यूटी के समय उसकी लोकेशन लगातार क्लीनिक पर मिली, जिससे उसकी भूमिका के पुख्ता साक्ष्य मिले।
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सीसीटीवी फुटेज बना अहम सबूत
एसटीएफ ने क्लीनिक के सामने बैंक के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज जुटाई। इनमें पीड़िता को उसकी मां और आरोपियों के साथ क्लीनिक ले जाते हुए देखा गया। स्थानीय पुलिस ने न तो यह फुटेज जुटाई थी और न ही पीड़िता की मां व डॉक्टर की पत्नी की भूमिका को विवेचना में शामिल किया था। एसटीएफ ने दोनों को आरोपी बनाया।
पर्यवेक्षण भी रहा सवालों के घेरे में
किसी भी गंभीर मामले की विवेचना की निगरानी वरिष्ठ अधिकारी करते हैं। इस प्रकरण में एसपी और एएसपी स्तर पर भी विवेचना की खामियां नहीं पकड़ी गईं। एसटीएफ की जांच के बाद यह सवाल उठ रहा है कि पर्यवेक्षण के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई गई, जिससे कमजोर विवेचना के कारण कई अहम साक्ष्य समय पर एकत्र नहीं हो सके।
पुलिस अधीक्षक विकास कुमार ने बताया कि मामले का परीक्षण किया जाएगा। अब तक हुई विवेचना की जानकारी करके आगे की कार्रवाई की जाएगी। प्रकरण की जांच की जाएगी।