तुलसीपुर। भोर की पहली किरण के साथ ही शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर का वातावरण जय मां पाटेश्वरी के उद्घोष से गूंज उठा। आषाढ़ मास के दूसरे सोमवार को आयोजित पारंपरिक गुड़ धनिया मेले में आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा कि पूरा मंदिर परिसर श्रद्धालुओं से भर गया। भारत ही नहीं, पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां पाटेश्वरी के दरबार में पहुंचे।
सीमाएं भले ही दो देशों को अलग करती हों, लेकिन मां पाटेश्वरी के चरणों में पहुंचते ही श्रद्धालुओं की आस्था एक नजर आई। यह दृश्य भारत और नेपाल के सदियों पुराने सांस्कृतिक और आत्मीय संबंधों को जीवंत करता दिखाई दिया।
सुबह से ही मंदिर में दर्शन-पूजन का सिलसिला शुरू हो गया। श्रद्धालु लंबी कतारों में घंटों इंतजार करने के बाद मां पाटेश्वरी के दर्शन करते रहे। किसी ने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की तो किसी ने अच्छी फसल और खुशहाली का आशीर्वाद मांगा। मंदिर परिसर में गूंजते घंटे-घड़ियाल, शंखनाद और मां के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
गुड़ धनिया मेले की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सदियों पुरानी कृषि परंपरा है। गेहूं की नई फसल घर पहुंचने के बाद किसान सबसे पहले उसका अन्न मां पाटेश्वरी को समर्पित करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से आए श्रद्धालु मंदिर परिसर में पारंपरिक तरीके से गेहूं और चने को भूनकर उसमें गुड़ मिलाते हैं। इसी विशेष प्रसाद को गुड़ धनिया कहा जाता है।
मां को नवीन अन्न का भोग लगाने के बाद श्रद्धालु नारियल के जल के साथ गुड़ धनिया का प्रसाद एक-दूसरे में वितरित करते हैं।
शक्तिपीठ के पीठाधीश्वर मिथिलेश नाथ योगी ने कहा कि गुड़ धनिया मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सनातन परंपरा, कृषि संस्कृति और भारत-नेपाल की आत्मीयता का प्रतीक है। मंदिर प्रबंधन से जुड़े अरुण गुप्ता ने बताया कि नेपाल और आसपास के जिलों से आने वाली भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा, पेयजल, बैरिकेडिंग, दर्शन व्यवस्था और अन्य आवश्यक सुविधाओं के विशेष इंतजाम किए गए थे।
फोटो-24-बलरामपुर के शक्तिपीठ देवीपाटन मंदिर में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु ।-संवाद