बलरामपुर। हर तरफ होली की धूम है। हर कोई तैयारी में लगा है। इसके बाद भी बुजुर्गों को पहले की होली और अब की होली में काफी कुछ बदलाव नजर आ रहा है। पहले बस बुरा न मानो होली है... के शब्द के साथ सारे गिले शिकवे मिट जाते थे। न कोई जाति का बंधन रहता था और न ही किसी को रंगों से कोई परहेज। एक सप्ताह पहले से ही होली की गूंज चहुंओर शुरू हो जाती थी।
पुुरैनिया तालाब मोहल्ला निवासी रिटायर्ड बैंककर्मी कमलाकांत तिवारी ने अपने बचपन के समय की होली की यादें साझा कीं। कहा कि जब वह छोटे थे तो एक सप्ताह पहले से ही होली की धूम शुरू हो जाती थी। पूरे गांव में घूम-घूमकर होली खेलने जाते थे। घरों में होली के गीत गाए जाते थे। शाम के समय एक गांव से दूसरे गांव लोग बैलगाड़ी से होली मिलने जाते थे। अब जमाना बदल गया है। पहले लोगों में अपनापन था, अब वह बात नहीं है।
उतरौला के ज्वाला प्रसाद कहते हैं कि पहले व अब में काफी अंतर आ गया है। पुराने समय में सात दिन पहले ही खरी व अन्य पदार्थ मिलाकर रंग तैयार किया जाता था। इसे मटके में भरकर ले जाया जाता था। इसके बाद हंसी ठिठोली के बीच मटका फोड़ दिया जाता था। कोई दूरी नहीं थी। हर कोई एक-दूसरे को रंग लगाने के साथ ही गले लगकर बधाई देता था।
रफीनगर के रामदुलारे का कहना है कि पहले गांव में कोई भी होली पर रंग व गुलाल से बच नहीं सकता था। जो मिला उसे बिना किसी परवाह के रंग लगा दिया जाता था। कोई बुरा भी नहीं मानता था। अब की होली और तब की होली में काफी कुछ बदल गया है।