लरामपुर। कोरोना महामारी की दस्तक के एक वर्ष पूरे हो गए हैं। देश भर में लगाए गए लॉकडाउन के दौरान तमाम तरह की दिक्कतें झेल चुके लोगों के जेहन में अभी भी उस समय की यादें बरकरार हैं। कारखानों के बंद होने और कोरोना संक्रमण की दहशत से जिले में 90 हजार प्रवासी लोगों का जत्था गैर राज्यों से कठिनाइयों को झेलते हुए अपने घर पहुंचा था।
इस दौरान उनके चेहरों पर अभाव, बेेबसी व मायूसी छाई थी। घरों पर आए तो काम की तलाश में जुटे। छह माह तक काफी संख्या में प्रवासियों को बेरोजगारी की मार झेलनी पड़ी थी। छह माह बाद शहरों में वापसी हुई तो वहां भी उन्हें काम के लिए दर-दर भटकना पड़ा। इस बीच कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर आने से लोग फिर से भयभीत हो गए हैं। लोग लॉकडाउन को याद करते हुए कहते हैं कि भगवान दोबारा ऐसे दिन किसी को न दिखाएं...।
जिले में वापस पहुंचे थे 90 हजार प्रवासी
एक दिवसीय जनता कर्फ्यू के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही देश में लॉकडाउन करने का एलान किया तो लोगों को जिंदगी वहीं पर थम गई। रोजगार छिन जाने के चलते बाहर रहने वाले लोगों को पैसे की कमी होने लगी। कुछ दिनों के इंतजार के बाद लॉकडाउन के दौरान ही लोगों ने पैदल व अपने निजी साधनों से घर वापस आना शुरू कर दिया।
प्रशासन के आंकड़े के मुताबिक जिले में 90 हजार से अधिक प्रवासी श्रमिकों का जत्था घर वापस लौटा। कुछ लोग पैदल आए तो कुछ लोगों को प्रशासन की तरफ से सरकारी बसों व स्पेशल ट्रेनों से लाया गया। पहले गैर राज्यों व जिलों से प्रवासी श्रमिकों को प्रशासन की तरफ से बनाए गए क्वारंटीन सेटरों पर 14 दिनों के लिए रखा गया।
बाद में संख्या बढ़ने पर होम क्वारंटीन का इंतजाम किया गया। शहर लौटने के बाद प्रवासियों के सामने रोजगार का संकट था। सदर ब्लॉक के भैंसहवा निवासी अमित ने बताया कि वह दिल्ली में एक कंपनी में काम करते थे। कंपनी की तरफ से उन्हें 12 हजार रुपये महीने दिए जाते था। लॉकडाउन में घर वापस आए तबसे कोई काम नहीं मिला।
सदर ब्लॉक के डबकी निवासी रमेश सूरत में कपड़ा फैक्ट्री में 14 हजार रुपये महीने की नौकरी करते थे। लॉकडाउन में घर लौटने के बाद से नौकरी की तलाश कर रहे हैं। वहीं सदर ब्लॉक के दुर्गापुर निवासी संतोष हरियाणा में और दीपक दिल्ली में नौकरी करते थे। कोरोना महामारी के डर से अभी तक बाहर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
खोया मानसिक सुकून, अस्थिर हुआ जीवन
लॉकडाउन में महामारी के भय के साथ लोगों ने मानसिक तकलीफें भी झेलीं। भागती-दौड़ती जिंदगी अचानक रुक गई। लोगों को कल की चिंता के साथ संक्रमण का डर, अकेलापन और अनिश्चितता के माहौल से जूझना पड़ा। चारों तरफ से हर वक्त कोरोना व खराब अर्थ व्यवस्था की खबरों से लोगों का मानसिक सुकून छिन गया था। जिन लोगों पर परिवार के लोग निर्भर थे और उनकी नौकरियां गईं तो घरों में उथल-पुथल मच गई। नौजवानों को अवसाद व तनाव से जूझना पड़ा।
मरीजों के इलाज का बढ़ा संकट
कोरोना संकट काल में अन्य रोगों से पीड़ित मरीजों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। तमाम मरीज इलाज से दूर हो गए। कोरोना संक्रमण के भय के चलते डायलिसिस से लेकर थरैपी व दवा लेने वाले मरीजों ने अस्पतालों का रुख नहीं किया। अधिकांश चिकित्सकों ने भी परामर्श बंद कर दिया। बीमारी से जूझ रहे कई लोग समय से इलाज न मिल पाने के कारण अपनी जान भी गवां बैठे। आपरेशन कराने वालों की संख्या में भारी कमी आई।
सामाजिक और आर्थिक असमानता में हुई बढ़ोत्तरी
लॉकडाउन ने गरीब-अमीर से लेकर महिलाओं व पुरुषों पर अलग-अलग असर डाला। 24 मार्च की रात में एक ओर शहरी लोग घरों में कैद हो गए वहीं प्रवासी अपने घरों को लौटने के लिए सड़कों पर आ गए। शहरों में काम करने वाले एक वर्ग को घर बैठे ऑनलाइन काम की सुविधा मिल गई, तो वहीं गांव के लोगों के पास आजीविका से समझौता करने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था।
बच्चों ने ऑनलाइन ली शिक्षा, तो कुछ रह गए वंचित
कोरोना संक्रमण काल में बच्चों को भी काफी कुछ झेलना पड़ा। बच्चों ने घरों में कैद रहकर अधिकांश समय मोबाइल, कंप्यूटर और टेलीविजन पर कार्यक्रमों को देखकर गुजारा। छोटे बच्चों के व्यवहार में परिवर्तन आया। लॉकडाउन में जिले के 1840 प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, कंपोजिट जैसे सरकारी, सात सौ गैर सरकारी परिषदीय स्कूलों के साथ-साथ 152 माध्यमिक जैसे राजकीय, वित्त पोषित व वित्तविहीन और करीब 20 महाविद्यालयों में ताले लग गए। जिले में करीब चार लाख से ऊपर बच्चों की पढ़ाई ठप हो गई। ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा मिला। डिजिटल डिवाइस और इंटरनेट तक पहुंच न होने से जिले में करीब 45 प्रतिशत बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई भी नहीं हो पाई।
प्रवासी श्रमिकों को काम देने का हुआ प्रयास
गरीब कल्याण रोजगार अभियान के तहत जिले में घर लौटे 90 हजार प्रवासी श्रमिकों को रोजगार मुहैया कराने का प्रशासनिक प्रयास शुरू हुआ। मनरेगा योजना में 30 हजार प्रवासी श्रमिकों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए गए। प्रवासी श्रमिकों को रोजगार देने के लिए करीब 34 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। सामुदायिक सहभागिता वाले स्वयं सहायता समूहों, बैंकों में सब्सिडी पर ऋण, राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण, सिंचाई व जल संसाधन वाले कार्यों, पौधरोपण, उद्यान, आंगनबाड़ी केंद्रों के निर्माण, प्रधानमंत्री शहरी व ग्रामीण आवास योजना, पीएमजीएसवाई, जल जीवन मिशन, कौशल विकास मिशन में हुनरमंदों को प्रशिक्षण, पानी की टंकियों के निर्माण सहित अन्य कई क्षेत्रों में लॉकडाउन के दौरान घर आए प्रवासी श्रमिकों को रोजगार के अवसर मुहैया कराए गए हैं। - श्रुति, डीएम