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नदी में समाहित खेत, जमीन व मकानों को बेबस देख रहे अन्नदाता

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उतरौला (बलरामपुर)। तिल-तिल नदी की धारा में समाहित हो रहे खेत, जमीन व मकानों को बेबस आंखों से अन्नदाता देख रहे हैं। थोड़ी बहुत बचाने की आस लेकर खुद अपना मकान तोड़ रहे अन्नदाता ईंट व पत्थर सिर पर उठाए सुरक्षित स्थान की तलाश में जुटे हुए हैं। सैकड़ों बीघा खेत, जमीन व मकान नदी की धारा में विलीन हो चुकी हैं। करोड़ों रुपये खर्च कर कटान रोकने के लिए प्रशासन हर साल कागजी घोड़ा दौड़ाकर ऑल इज वेल का स्टीकर लगाकर शासन को भी गुमराह कर रहा है।
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उतरौला तहसील क्षेत्र के ग्राम लालनगर विरदा, फत्तेपुर, परसौना, गोनकोट, महुआधनी व कटरा वर्तमान समय में राप्ती नदी की कटान का मुख्य केन्द्र बना हुआ है। नदी में किसानों की खेत, जमीन व पक्के मकान अपने आगोश में लेने को आतुर है। लाख कोशिशों के बावजूद बेबस किसान न तो खेत बचा पा रहे हैं और न ही गाढ़ी कमाई से तैयार मकान। कुछ अन्नदाता खून-पसीने से तैयार मकान खुद अपने हाथों से तोड़ रहे हैं।
किसानों का कहना है कि हर साल राप्ती नदी की बाढ़ से किसानों की हजारों हेक्टेअर फसल बर्बाद हो जाती है। फसलें बर्बाद होने से फायदा तो दूर अपनी गाढ़ी कमाई भी गवां देते हैं। बाढ़ आने पर ही कुछ ही दिन अफसर व कर्मी गांव के पास आकर सीमेंट की बोरियों में बालू भरकर नदी में डालकर चले जाते हैं। पूरा साल कटान रोकने का कोई प्रयास नहीं किया जाता है।
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डीएम कृष्णा करुणेश ने बताया कि जिले में जिन स्थानों पर पहाड़ी नालों व राप्ती नदी की वजह से कटान हो रहा है वहां पर राजस्व व बाढ़ खंड के अधिकारियों को लगाया गया है। कटान रोकने का काम युद्घस्तर पर किया जा रहा है। कार्य में लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। जिन किसानों की फसलें बर्बाद हुई हैं उन्हें मुआवजा दिया जाएगा।
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