न्यायालय ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए माना कि आवश्यक निर्देश उपलब्ध नहीं कराना सुनवाई टालने का प्रयास प्रतीत होता है। इसी के मद्देनजर जिलाधिकारी पर 20 हजार रुपये की लागत लगाई गई है। यह धनराशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि जिलाधिकारी को अपने व्यक्तिगत खाते से हाईकोर्ट के मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र में जमा करनी होगी। राशि जमा करने के बाद उसकी रसीद न्यायालय के रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करनी होगी।
इसके अलावा जिलाधिकारी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर बताना होगा कि संबंधित मामले में आवश्यक निर्देश समय से क्यों नहीं भेजे गए। न्यायालय ने साफ किया है कि अगली सुनवाई से पहले आदेश का अनुपालन नहीं किया गया तो जिलाधिकारी को स्वयं न्यायालय में उपस्थित होना होगा। हाईकोर्ट ने मामले को 13 नवंबर को नए मामलों की सूची में शामिल कर सुनवाई के लिए प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
जिलाधिकारी विपिन कुमार जैन का कहना है कि प्रकरण जनपद की सदर तहसील से संबंधित था। इस प्रकरण में आवश्यक निर्देश प्राप्त करने हेतु पत्राचार किया गया था, लेकिन न्यायालय के समक्ष समयबद्ध निर्देश प्रस्तुत नहीं हो सके। प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए आवश्यक अभिलेखों एवं पत्राचार की समीक्षा की जा रही है तथा संबंधित अधिकारियों से प्रभावी कार्यवाही सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। न्यायालय के आदेशों का पूर्ण सम्मान करते हुए निर्धारित समयावधि में अनुपालन किया जाएगा।