मोदी के श्वेत क्रांति की परिकल्पना को शायद राष्ट्रीयकृत बैंक धरातल पर फलीभूत नहीं होने देना चाह रहे हैं। तभी तो वर्ष 2014 से पशु विभाग की स्वीकृति के बावजूद छह फाइलें अभी तक धूल फांक रही है। ऐसे में प्रदेश सरकार द्वारा संचालित कामधेनु, मिनी डेरी व माइक्रो डेरी योजना का लाभ पशुपालकों को नहीं मिल पा रहा है।
पशुपालकों के लिए सरकार द्वारा दुग्ध उत्पादन के लिए तरह-तरह की योजनाएं बनाई गईं हैं, ताकि प्रदेश में दूध का उत्पादन बढ़े। लेकिन प्रशासन व बैंकों की उदासीनता के चलते पशुपालकों को इस योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
उन्हें कभी विभाग तो कभी बैंक का चक्कर काटना पड़ रहा है। जनपद में देखा जाय तो दूध उत्पादन के लिए तीन कामधेनु , आठ मिनी डेरी व 20 माइक्रो डेरी का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य सत्र 2014-16 से ही चला आ रहा है।
अब तक की रिपोर्ट पर गौर करें तो कामधेनु को छोड़कर मिनी डेरी की दो फाइलें तथा माइक्रो डेरी की स्वीकृत 10 फाइलों में चार समेत कुल छह फाइलें बैंकों में धूल फांक रही है। ऐसे में दूध उद्योग को बढ़ावा मिले तो कैसे मिले!
जहां सरकार किसानों एवं बड़े काश्तकारों को डेरी उद्योग में प्रोत्साहित करने के लिए तरह-तरह की योजनाएं चला रही हैं वहीं बैंक के कायदे-कानून के पेच में कई फाइलें बीच में ही दम तोड़ देती है। जिससे सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन धरातल पर नहीं हो पाता है।
बैंकिंग एक्ट 143 के तहत कृषि योग्य भूमि में आप किसी प्रकार का उद्योग नहीं कर सकते हैं। जबकि संबंधित के पास परती व बंजर जमीन उपलब्ध ही नहीं रहती है। ऐसे में बैंकिंग नियम कानून के पेंच में आधा से अधिक फाइलें फंसकर रह जाती है।