संवाद के दौरान उपस्थित लोगों ने बताया कि यहीं पर जेपी ने जनेऊ तोड़ो आंदोलन का शंखनाद किया था। उन्हें गांव के लोगों के सम्मान, विकास, शिक्षा को लेकर काफी चिंता थी। 1978 में जेपी अंतिम बार अपने पैतृक गांव सिताब दियारा आए तो काफी अस्वस्थ थे। फिर भी शुभचिंतकों से मिलने के इच्छुक थे। सूचना मिलते ही जेपी के यहां लोगों का तांता लग गया। तीन दिन तक वह गांव पर रहे।
वापस 11 सितंबर 1978 को हेलीकॉप्टर में बैठने लगे तो उस समय पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर साथ थे। चंद्रशेखर से कहा कि चंद्रशेखर हमाारे गांव का ख्याल रखिएगा। यह कहते हुए उनकी आंखें भर आई थीं। उपराष्ट्रपति ने बिहार सरकार के निमंत्रण पर वहां बुलाए गए लोकतंत्र रक्षक सेनानियों से संवाद किया। लगभग 45 मिनट तक सिताब दियारा में रुकने के बाद उपराष्ट्रपति बिहार के राज्यपाल के साथ सड़क मार्ग से पटना वापस लौट गए।
आवागमन रोकने से हुई परेशानी
अपने निर्धारित समय 11.50 बजे से 45 मिनट विलंब से उपराष्ट्रपति राज्यपाल के साथ पटना हवाई अड्डा से सड़क मार्ग से जयप्रकाश नगर पहुंचे थे। उनके आगमन को देखते हुये बैरिया से पूरब बिहार बार्डर तक उत्तर प्रदेश पुलिस ने वाहनों का परिचालन रोकने के साथ ही आम लोगों के आवागमन पर प्रतिबंद लगा दिया था।
मांझी से पटना तक कि सड़क को भी बिहार प्रशासन ने लोगों की आवाजाही के लिए बंद कर दिया था। इससे लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। जब पुलिस ने एनएच-31 पर आवागमन रोक दिया तो धूप में छोटे-छोटे बच्चे परेशान दिखे। चांददीयर चौकी के पास पत्रकारों के वाहनों को भी चौकी इंचार्ज चांददीयर ने रोक दिया था। लाला टोला का कार्यक्रम स्थल पूरी तरह से एनएसजी कमांडो के पर्यवेक्षण में था।