बलिया। जनपद के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों व संसाधन की कमी से कारण स्वास्थ्य व्यवस्था महानगरों पर आश्रित है। 40 लाख की आबादी पर एक आईसीयू वार्ड तक नहीं है। जबकि कोरोना काल के समय के 38 वेटिंलेटर ताले में बंद है। छोटी मोटी बीमारियों को छोड़ दें तो 60 फीसदी गंभीर मरीज वाराणसी, मऊ रेफर होते हैं। समय से इलाज न मिलने पर कई मरीजों की रास्ते में मौत हो जाती है।
जिले से 90 किमी लंबा एनएच-31 गुजरता है। इसपर आए दिन दुर्घटना में घायल लोगों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्राथमिक उपचार के बाद जिला अस्पताल रेफर किया जाता है। रेफर होकर जिला अस्पताल आने वाले दुर्घटना के 60 और प्रसव के 10 फीसदी केस संसाधन के अभाव में रेफर होते हैं। गंभीर होने पर उन्हें सीधे वाराणसी बीएचयू ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया जाता है। रेफर होने वाले लोगों में सबसे अधिक संख्या दुर्घटना में घायल लोगों और उसके बाद हार्ट संबंधित गंभीर मरीजों की है। एनएच-31 पर सीएचसी नरहीं, दुबहड़ व सोनबरसा बैरिया है। यहां सिर्फ दो पर 24 घंटे इमरजेंसी सुविधा मिलती है। चिकित्सक व संसाधन के अभाव में गंभीर मरीजों को सिर्फ प्राथमिक इलाज ही नसीब हो पाता है। रोजाना औसतन 10 से 15 मरीज जिला अस्पताल की इमरजेंसी से रेफर होते हैं।
सीमावर्ती इलाके के मरीजों को ले जाते हैं वाराणसी, मऊ और गोरखपुर
रसड़ा, सीयर, सिकंदरपुर सहित अन्य स्वास्थ्य केंद्रों से रेफर होने वाली मरीजों की संख्या करीब हर माह 20 से 25 है। सीएचसी से जिला अस्पताल आने वाले मरीजों में 80 फीसदी दुर्घटना में घायल, 10 फीसदी प्रसव पीड़िता तो 10 फीसदी गंभीर मरीज होते हैं। सीएचसी के डॉक्टर सीधे मरीज को बीएचयू, गोरखपुर रेफर नहीं कर सकते हैं। उन्हें पहले जिला अस्पताल भेजते हैं। यहां से मरीजों को रेफर किया जाता है। जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों के गंभीर मरीजों के परिजन बेहतर इलाज के लिए जिला अस्पताल की जगह मऊ, वाराणसी व गोरखपुर लेकर चले जाते हैं।
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जिला अस्पताल का ट्राॅमा सेंटर शुरू होने से सड़क दुर्घटना के गंभीर मरीज रेफर होने की संख्या कम हुई है। ज्यादा गंभीर मरीज को बेहतर इलाज के लिए हायर सेंटर भेजा जाता है। आने वाले दिनों में अस्पताल में आईसीयू या सीसी यूनिट शुरू होने के बाद मरीजों को इलाज मिलने लगेगा। ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों को संसाधन बढ़ाए जा रहे हैं। - डॉ. संजीव वर्मन, सीएमओ बलिया।