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Ballia News: सिद्धांतों की राजनीति के प्रतीक थे युवा तुर्क

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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर।
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भीमपुरा। देश के पूर्व प्रधानमंत्री और बलिया की धरती के गौरव दिवंगत चंद्रशेखर की 19वीं पुण्यतिथि बुधवार को मनाई जाएगी। सिद्धांतों, सादगी और बेबाक राजनीति के लिए पहचान रखने वाले चंद्रशेखर आज भी लोकतांत्रिक मूल्यों और वैचारिक राजनीति के प्रतीक माने जाते हैं।
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बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गांव में 17 अप्रैल 1927 को एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे चंद्रशेखर छात्र जीवन से ही सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ गए थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद समाजवादी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। आचार्य नरेंद्र देव के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने प्रजा समाजवादी पार्टी से राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और कम समय में उत्तर प्रदेश स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।
1962 में वह पहली बार राज्यसभा पहुंचे थे
वर्ष 1962 में वह पहली बार राज्यसभा पहुंचे। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए और 1967 में कांग्रेस संसदीय दल के महासचिव बने। संसद में उन्होंने दलितों, वंचितों और कमजोर वर्गों के अधिकारों की जोरदार पैरवी की। सत्ता के भीतर रहते हुए भी उन्होंने गलत नीतियों का खुलकर विरोध किया, जिसके कारण उनकी पहचान कांग्रेस के युवा तुर्क नेताओं में बनी। चंद्रशेखर ने 1969 में साप्ताहिक पत्रिका यंग इंडियन की स्थापना की और उसके संपादक रहे। आपातकाल के दौरान पत्रिका का प्रकाशन बंद करा दिया गया। 25 जून 1975 को आपातकाल लगने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। जेल प्रवास के दौरान लिखी गई उनकी जेल डायरी आज भी राजनीतिक साहित्य की महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है।
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4,260 किलोमीटर की ऐतिहासिक भारत यात्रा
जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने 1977 से 1988 तक संगठन का नेतृत्व किया। 6 जनवरी से 30 जून 1983 तक उन्होंने कन्याकुमारी से नई दिल्ली तक करीब 4,260 किलोमीटर की ऐतिहासिक भारत यात्रा की। इस पदयात्रा का उद्देश्य आम लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझना और सामाजिक-राजनीतिक चेतना को मजबूत करना था। इसके बाद उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में 15 भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना भी कराई।
परिवारवाद, क्षेत्रवाद और व्यक्तिवादी राजनीति के प्रखर विरोधी
चंद्रशेखर परिवारवाद, क्षेत्रवाद और व्यक्तिवादी राजनीति के प्रखर विरोधी थे। उनका मानना था कि राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना होना चाहिए। अपने पूरे राजनीतिक जीवन में उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक न्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। बोन कैंसर से पीड़ित होने के बाद 8 जुलाई 2007 को उनका निधन हो गया। उनकी पुण्यतिथि पर बुधवार को बलिया सहित प्रदेश और देश के विभिन्न स्थानों पर श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। उनके विचार और राजनीतिक आदर्श आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।
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