जनपद में सौ से अधिक गांव अभी भी कटान प्रभावित हैं। इन गांवों पर इस साल खतरा मंडरा रहा है। वजह यह कि पिछले साल जो कटान के दौरान सुरक्षा के इंतजाम किए गए थे वे पुख्ता नहीं थे, जिसका खामियाजा तटवर्ती गांव के लोगों को इस साल भी भुगतना होगा।
मानसून सक्रिय होने के साथ ही गंगा और घाघरा के तटवर्ती गांव के लोगों के दिलों की धड़कनें भी बढ़ने लगी हैं। उन्हें कटान की चिंता सताने लगी है। पिछले दो दशक पर गौर किया जाय तो जनपद में गंगा और घाघरा नदी के कटान में जहां दर्जनों गांवों का अस्तित्व मिट चुका है, वहीं सैकड़ों बीघे खेत गंगा में समा गए हैं। शासन-प्रशासन एवं बाढ़ विभाग ने बचाव राहत के नाम पर अलग-अलग हथकंडे अपनाए। कभी बोल्डर के स्पर तो कभी जियो विधि से प्लेटफार्म बनाया। बावजूद आज तक न तो कोई गांव न तो एनएच-31 व टीएस बंधे सुरक्षित बच सकें।
जनपद के छह तहसीलों में बैरिया, सिकंदरपुर और बांसडीह बाढ़ प्रभावित हैं, इन तहसीलों में प्रत्येक साल गंगा और घाघरा बाढ़ के दौरान कहर बरपाती हैं, जिससे सैकड़ों गांव के लोग प्रभावित होते हैं। पिछले कुछ साल के दौरान गंगा के कटान से बैरिया तहसील के गायघाट, बघौच, बेलहरी, रूद्रपुर, धर्मपुरा, मझौवा, पचरूखिया, नारायणपुर, हुकुमछपरा, उपाध्याय टोला, मीनापुर, गंगापुर, दुर्जनपुर, चौबेछपरा, शाहपुर, रिकनीछपरा, गंगौली, श्रीनगर, नरदरा, भूसौला, गड़ेरिया गांव का अस्तित्व मिट चुका है। उधर, घाघरा नदी ने इब्राहिमाबाद नौबरार के लाल टोला, सुफल टोला, रामेश्वर टोला, भवन टोला का कुछ हिस्सा, टीलापुर, माझा, मानगढ़ गांव का अस्तित्व मिटा दिया।
अगर बाढ़ विभाग लापरवाह बना रहा तो इस वर्ष गंगा के मुहाने पर बसे श्रीनगर का अवशेष भाग, केहरपुर, सुघरछपरा, चौबेछपरा का अवशेष भाग, दूबेछपरा, गोपालपुर, उदइछपरा तथा दूबे छपरा रिंगबंधा समेत अन्य गांवों का इतिहास और भूगोल बदल जाएगा।