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Ballia News: 25 साल में मरीजों की संख्या चार गुना बढ़ी, डॉक्टर और कर्मचारी जस के तस

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जिला अस्पताल परिसर ​स्थित आपातकालीन कक्ष।संवाद
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बलिया। जिला अस्पताल में 25 साल में मरीजों की संख्या में चार गुना तक का इजाफा हुआ है। लेकिन संसाधन, चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या जस की तस है। 25 साल पहले 300 से 400 की ओपीडी होती थी और 23 डॉक्टरों समेत 93 पद सृजित थे। आज रोजाना 1500 से 2000 की ओपीडी होती है। बेड की संख्या भी 176 से बढ़कर 236 हो गई है लेकिन डॉक्टरों और कर्मचारियों की संख्या 25 साल पहले की ही है। इस कारण मरीजों को बेहतर इलाज के लिए निजी अस्पताल जाना पड़ता है। ट्राॅमा सेंटर में सुविधा न होने के कारण सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल लोगों को वाराणसी व मऊ जाना पड़ता है।
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जिला अस्पताल में पच्चीस वर्ष पूर्व सीएमएस, 23 डॉक्टर, 30 स्टाफ नर्स, आया, चीफ फार्मासिस्ट समेत 93 पद सृजित थे। इस अवधि में 150 बेड का एनेक्सी भवन, इमरजेंसी व ट्राॅमा सेंटर बना, लेकिन संसाधन, चिकित्सक व कर्मचारियों की संख्या नहीं बढ़ी। उस समय 176 बेड थे जबकि आज 236 बेड का संचालन हो रहा है। 236 बेड पर कम से कम 45 चिकित्सक चाहिए, लेकिन 23 चिकित्सक ही तैनात हैं, उसमें भी कई संविदा पर तैनात हैं। नर्स की संख्या घटकर 28 हो गई। एक नर्स पर छह की जगह 35 मरीजों की जिम्मेदारी है। अस्पताल में मरीजों की संख्या चार गुना तक बढ़ गई। वर्तमान में ओपीडी में रोजाना 1500 से 2000 मरीज आते हैं।
वर्ष 2015 के बाद इमरजेंसी व ट्राॅमा सेंटर बना और शुरू हुआ लेकिन स्टाफ नहीं बढ़े। ट्राॅमा सेंटर में करोड़ों के आधुनिक उपकरण ताले में बंद हैं। जिला अस्पताल के ही सर्जन व आर्थो सर्जन वहां बैठते हैं। उपकरण व कर्मचारियों की कमी के कारण गंभीर मरीजों को वाराणसी या आजमगढ़ रेफर कर दिया जाता है।
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अस्पताल में बड़े ऑपरेशन बंद
जिला अस्पताल की ओटी में दो वर्ष से आर्म मशीन खराब होने से फ्रैक्चर, पेट संबंधी बड़े ऑपरेशन नहीं होते हैं। मशीन की खरीदारी के लिए शासन से लगभग सात महीने पहले 19 लाख रुपये जारी हुए थे, लेकिन अब तक खरीदारी न होने से मरीजों को सुविधा नहीं मिल रही है। वहीं एक वर्ष पूर्व लेप्रोस्कोपी विधि से ऑपरेशन के लिए मशीन मिली, लेकिन वह दो दिन बाद ही खराब हो कर शोपीस बनी हुई है। उससे एक भी ऑपरेशन नहीं हुआ है। फिलहाल हाइड्रोसिल, इल्ला जैसे छोटे ऑपरेशन हो रहे हैं। अन्य ऑपरेशन के लिए मरीजों को निजी अस्पताल में जाना पड़ रहा है।
ईएनटी सर्जन व त्वचा रोग विशेषज्ञ की कमी
जिला अस्पताल में हृदय रोग विशेषज्ञ सहित अन्य रोग विशेषज्ञ चिकित्सक तो दूर की बात है, लंबे समय से ईएनटी सर्जन, त्वचा रोग विशेषज्ञ चिकित्सक की भी कमी है। इस कारण मरीजों को निजी अस्पताल में जाकर इलाज कराना पड़ता है।

दिन के हिसाब से बिछाई जाती है चादर



जिला अस्पताल में बेड के लिए चादर की समय-समय पर खरीदारी होती होती रहती है। दिन के हिसाब से कलर वाली चादर रोजाना बिछाई जाती है। चादर की धुलाई आधुनिक मशीन से की जाती है। बेड टूटने पर नए की खरीदारी होती रहती है।

जिला अस्पताल में उपलब्ध चिकित्सकीय सुविधा का लाभ मरीजों को दिया जा रहा है। पैथोलॉजी में 122 प्रकार की खून व हार्मोंनल की निशुल्क जांच होती है। समय-समय पर चिकित्सकों व स्वास्थ्यकर्मियों की मांग करते हुए पत्र जारी भेजा जाता है। स्वास्थ्यकर्मियों की कमी के बावजूद मरीजों को बेहतर इलाज की सुविधा मिल रही है। - डॉक्टर एसके यादव, सीएमएस जिला अस्पताल बलिया।
बेटी के पैर में घाव होने पर जिला अस्पताल में चिकित्सक से दिखाया, उन्होंने दवा दी, राहत न मिलने पर दूसरी जगह दिखाने के लिए कहा। वाराणसी जाकर घाव का ऑपरेशन करवाया। - नीतू पांडेय, नसीराबाद।
सड़क दुर्घटना में मित्र का पैर फ्रैक्चर होने पर जिला अस्पताल के ट्राॅमा सेंटर में दिखाया, वहां ऑपरेशन कर राड डालने की बात कह कर वाराणसी रेफर कर दिया गया। वाराणसी में ऑपरेशन हुआ। प्रिंस कुमार, सागरपाली
जिला अस्पताल में सर्दी जुकाम व बुखार छोड़कर गंभीर मरीजों का इलाज नहीं होता है। इसके लिए मरीजों को वाराणसी व मऊ जाना पड़ रहा है। इससे पैसे और समय दोनों का नुकसान होता है। सुनील कुमार, मोहन छपरा
जिला अस्पताल में पथरी का ऑपरेशन नहीं होता है। मरीजों को निजी अस्पतालों में ऑपरेशन करवाना पड़ता है। कई बार लोग अप्रशिक्षित से इलाज करवा कर समस्या बढ़ा लेते हैं। मनोज कुमार, दुबहड़
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