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आजादी के दीवानों ने 1942 में ही बांसडीह को करा लिया था आजाद

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घोघा। आजादी की लड़ाई में जहां देशभर के हजारों क्रांतिकारियों व सेनानी ने अपने प्राण की आहुति दी तो बांसडीह तहसील में भी फौलादी हौसलों से रणबांकुरों ने बिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी। आजादी के जंग में यहां के युवाओं की टोली ने इतिहास कायम करते हुए बिना किसी खूनखराबा किए पांच वर्ष पूर्व ही आजादी का स्वाद चख लिया था। देश को स्वतंत्र कराने के लिए पूरे देश में जो लहर चल रही थी, उसमें यहां के वीरों ने बिना एक कतरा खून बहाए ही 17 अगस्त 1942 को सेनानियों की युवा टीम ने बांसडीह को आजाद करा लिया था। वीर सेनानियों ने ऐसे कार्य गुपचुप तरीके से किए कि अंग्रेजों की इसकी भनक तक नहीं लग सकी।
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17 अगस्त 1942 की सुबह आठ बजते ही य़ुवा सेनानियों की एक टोली ने तहसील और थाने को चारों ओर घेर लिया। देखते ही देखते देश प्रेम के जब्जों से भरा युवाओं का जन समूह बांसडीह के तहसीलदार और थानाध्यक्ष तक पहुंच गया। सेनानियों के हौसले को जज्बे को देख दोनों अधिकारी अपनी कुर्सी छोड़ सेनानियों के समक्ष आ गए। इस दौरान थाने के दारोगा ने गांधी टोपी पहनकर हाथ में तिरंगा लिए आजाद भारत की घोषणा कर दी। इसे देख सेनानियों ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष बांसडीह तहसील के बकवां निवासी गजाधर शर्मा को तहसीलदार की कुर्सी पर बैठा दिया। उस दौरान स्वर्णिम इतिहास के साक्षी बने तहसील और थाना भवन आज जर्जर स्थिति में पहुंच चुके हैं तथा तहसील और थाना नए भवन में संचालित हो रहे हैं। आजादी के पांच वर्ष पूर्व ही अंग्रेजों को अपनी धरती से विदा कराने वाले ऐतिहासिक दोनों भवन जमींदोज होने की कगार पर हैं।
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