बलिया। जिला मुख्यालय पर श्रावण पूर्णिमा के दिन निकलने वाले महावीरी झंडा जुलूस आस्था के आजादी के जंग का प्रतीक है। पहला जुलूस 1910 ई. में जॉर्ज पंचम की ताजपोशी के खिलाफ और लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के सम्मान गवर्नमेंट स्कूल बलिया के छात्रों द्वारा ठाकुर जगन्नाथ सिंह के नेतृत्व में बने विद्यार्थी परिषद ने निकाला था। पहले जुलूस में पं. हृदय नारायण तिवारी, केदारनाथ उपाध्याय, मुनीश्वर मिश्र, शिवदत्त तिवारी, पं. परशुराम चतुर्वेदी सहित कुल 35 छात्र शामिल हुए थे। आदित्यराम मंदिर से लंबे बांस में लाल झंडे पर तिलक महाराज की जय लिखकर जुलूस निकाला गया था।
इन छात्रों को तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर मिस्टर जैप्लीन ने स्कूल से निष्कासित कर दिए थे। इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय बताते हैं कि महावीरी झंडा जुलूस में झांकियों की परंपरा 1927 ई. में शुरू हुई। हनुमानगढ़ी मंदिर से पालकी पर हनुमान जी मूर्ति सजाकर जुलूस निकला था। ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध युवाओं के विद्रोह वाले इस जुलूस को ब्रिटिश साम्राज्य सरकार के अफसरों ने हिंदू-मुस्लिम समाज को आपस में लड़ाने के हथियार बनाने की नाकाम साजिश की। 1930 ई. में सरकार परस्त लोगों ने विष्णुपुर मस्जिद से जुलूस पर पथराव किए। जवाबी कार्रवाई में जुलूस में शामिल लोगों ने भी मस्जिद पर पथराव किए। जुलूस जब आक्रामक हुआ तब पुलिस ने गोली चलाई और सिनेमारोड के केदार नोनिया मारे गए थे व दर्जनों लोग घायल हुए थे। संवाद