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कहीं बने आधे अधूरे तो कहीं बने ही नहीं

Mon, 26 Mar 2018 10:59 PM IST
ballia
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शौचालय
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जिले के गांवों को खुले में शौचमुक्त बनाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। लेकिन, जिम्मेदार लोगों की लापरवाही और उदासीनता से इन्हें समय से ओडीएफ करा पाना मुश्किल है। कुछ शौचालय बने ही नहीं, जो बने तो उनका निर्माण आधा अधूरा ही रहा। जो गांव ओडीएफ घोषित किए जा चुके हैं, वहां भी लोग खुले में शौच जाने को विवश हैं। जनपद में दो अक्तूबर 2014 को स्वच्छता मिशन योजना के तहत गांवों को ओडीएफ करने की शुरुआत की गई। तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस अभियान सफल नहीं हो सका। जिले के कुल 1843 गांवों को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) करने के लिए कुल तीन लाख 87 हजार 980 शौचालय बनाने का लक्ष्य निर्धारित है।
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लाख प्रयास के बावजूद शौचालय निर्माण गति जोर नहीं पकड़ रही है। हालांकि पंचायती राज विभाग की ओर से अभी तक कुल 103 गांवों को ओडीएफ घोषित किया गया है। लेकिन अधिकांश ओडीएफ गांवों में जमीनी हकीकत कुछ और ही है। अभियान के तहत कई गांवों में शौचालय की धनराशि की खूब बंदरबांट हुई।

कई मामलों में तो विभाग ने मुकदमा भी दर्ज कराया है। पूर्व में दिसंबर 2017 तक सभी गांवों को ओडीएफ करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था लेकिन विभागीय उदासीनता के चलते दिसंबर 17 तक 103 गांव ही ओडीएफ हो सके थे। इसके चलते शासन की ओर से इसकी समय सीमा बढ़ाते हुए दिसंबर 2018 तक कर दी है। हालांकि अभी भी शौचालयों के निर्माण को लेकर कोई खास तेजी नहीं आई है।
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लेकिन विभाग का दावा है कि वर्तमान में जिले के कुल 126 गांव ओडीएएफ हो चुके हैं और 27 ग्राम पंचायतों से ओडीएफ प्रस्ताव मिले हैं जिसका सत्यापन कराया जा रहा है। लेकिन अभी इसमें कोई खास प्रगति समझ में नहीं आई है।

इस हिसाब से यदि 153 गांव घोषित भी हो जाते हैं तो शेष 1690 गांवों को निर्धारित समय सीमा में ओडीएफ करना आसान नहीं होगा। बीते माह में कुल 36 हजार 340 शौचालय निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया था लेकिन महज 1629 शौचालयों का ही निर्माण हो सका है। ओडीएफ घोषित गांवों में भी धरातल पर स्थिति विभागीय दावे के विपरीत है। बतौर उदाहरण शहर से सटे दुबहड़ ब्लाक के जमुआ गांव को ओडीएफ घोषित किया गया है।

 इस गांव को ओडीएफ करने के लिए वर्ष 2016-17 में 520 शौचालयों के निर्माण के लिए कुल 62 लाख 40 हजार की धनराशि विभाग से मुहैया कराई गई। लेकिन देखा जाए तो दो साल बाद भी अधिकांश शौचालयों का निर्माण कार्य अधर में ही है।
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