अभिभावकों की तरफ से गुरुवार को अधिवक्ता मनोज राय ने डीएम को ज्ञापन सौंपकर बताया कि निजी स्कूल संचालक मनमानी पर उतारू हैं। शिक्षा के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।
ज्ञापन में बताया है कि प्रत्येक सेक्सन में 40 से 45 बच्चों को पढ़ाने का मानक है। जबकि दो गुना बच्चे पढ़ाए जा रहे हैं। इससे अभिभावकों को या तो स्वयं बच्चों को पढ़ाना पढ़ता है या फिर स्कूल के किसी शिक्षक को ट्यूटर रखना पड़ता है। विद्यालयों की ओर से री एडमिशन के नाम पर हर साल हजारों रुपये लिए जाते हैं।
यहां तक कि स्कूल स्वयं महंगी दर पर किताबें भी बेचते हैं। शासनादेश के मुताबिक बच्चों का फ्री मेडिकल चेकअप होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं कराया जाता। 12 अप्रैल 2012 से लागू शिक्षा अधिकार अधिनियम के तहत अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा भी विद्यालयों से गायब है।
मामले की जांच होनी चाहिए। मांग की कि मीटिंग बुलाकर अभिभावकों और निजी विद्यालयों के संचालकों को स्पष्ट दिशा निर्देश दिया जाना चाहिए। वाहन की पूरी फीस देने के बाद भी बच्चों को जानवरों की तरह ठूंस कर ले जाया जाता है। प्रकरण में पहले भी डीएम को पत्र लिखा गया था।
इस पर सीओ सिटी और एआरटीओ की टीम बनाकर स्कूली बसों में मानक तथा स्कूल के सेक्सनों में बच्चों की संख्या की जांच का निर्देष दिया गया था लेकिन आज तक इसका पालन नहीं किया गया। प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए डीएम मुरली मनोहर लाल ने कहा कि शीघ्र जांच कराई जाएगी और दोषी पाए जाने पर उनके खिलाफ कार्रवाई होगी।