बलिया। अमर उजाला अभियान के तहत रविवार को नगर से सटे अगरसंडा स्थित फीनिक्स इंटरनेशनल स्कूल में आयोजित अपराजिता 100 मिलिंयस स्माइल कार्यक्रम में ‘महिलाओं पर होने वाले अपराध और न्याय में देरी क्यों’ विषय पर महिला शिक्षकों ने खुलकर संवाद किया। इसमें महिलाओं ने एक स्वर से महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के लिए रूढ़िवादिता, सोच, संस्कार, शिक्षा के अभाव के साथ ही दोषियों को विलंब से सजा देेने में न्यायपालिका को भी दोषी ठहराया। कहा कि यदि शीघ्र न्याय मिलता तो निश्चित ही अपराध पर काफी हद तक अंकुश लगता।
- प्रधानाचार्य आभा पांडेय का कहना है कि समाज में लोग रूढ़िवादिता से ऊपर उठें, सोच व व्यवहार बदलें तथा बचपन से बच्चों के अंदर संस्कार की शिक्षा ग्रहण कराएं तो महिलाओं के समक्ष होने वाली चुनौतियों पर काबू पाया जा सकता है, क्योंकि संस्कार व सोच से ही किसी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का उत्थान और पतन निश्चित होता है। यह शिक्षा के बगैैर के संभव नहीं है। इसके लिए शिक्षित महिलाओं को आगे आकर अन्य माताओं व बहनों को जागृत करना होगा, तभी माताएं व बहनें पग-पग पर आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकेंगी।
- शिक्षिका सुनीता पर्वत ने कहा कि महिलाओं के समक्ष मां के गर्भ से लेकर मरणोपरांत तक चुनौतियां ही चुनौतियां रहती है। जिसको झेलते हुए महिलाएं ईमानदारी व निष्ठा पूर्वक परिवार व समाज का सेवा करती है। पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की चुनौतियां इतनी जल्दी समाप्त नहीं होगी। हालाकि लोगों की सोच बदल रही है। जिसके कारण आज महिलाएं आत्मनिर्भर निर्भर बनने के क्षेत्र में कदम आगे बढ़ा रही है। इसमें और जागरूकता की आवश्यकता है।
- शिक्षिका मलिका खान ने कहा कि महिलाओं पर होने वाले अपराध के लिए परिवार के साथ ही पड़ोसी भी दोषी है। यदि महिलाएं कुछ करने या आवाज बुलंद करना चाहती है तो कुछ परिवार के लोग उसका सपोर्ट करते है, जबकि कुछ उसका विरोध करते है। इसके लिए रूढ़िवादिता सोच को बदलकर, बचपन से बच्चों के अंदर संस्कार रूपी शिक्षा देकर तथा लड़का-लड़की के अंतर के खाई को पाटकर दूर किया जा सकता है।
- शिक्षिका ऋषिका सिंह का कहना है कि बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ सेक्स एजुकेशन की शिक्षा भी अलग से देनी चाहिये। ताकि उन्हें गलत सही का एहसास हो सके। इसके लिए सीबीएसई ने प्रत्येक विद्यालयों में एक अलग से काउंसलर रखने के लिए निर्देशित किया है। इसके अलावा लड़का या लड़की से अभिभावक को खुलकर बात करनी चाहिए और सही गलत का एहसास कराना चाहिये। क्योंकि किशोर गलत कार्य तो कर बैठते है, लेकिन उन्हें यह पता नहीं होता कि इसके बदले में उसे किसी प्रकार की सजा हो सकती है।
- सुनीता सिंह का कहना है कि समाज में महिलाओं की रक्षा के लिए बनाए गए कानून में न्याय प्रक्रिया ही काफी हद तक दोषी है, जो कानून तोडऩे वाले को सजा सुनाते-सुनाते वर्षो समय लगा देती है। खासतौर से रेप व छेड़खानी के मामले में अपराधी को त्वरित सार्वजनिक तौर पर कड़ी से कड़ी सजा देने का प्राविधान बनाना चाहिये। इसके लिए महिला व पुरुष दोनों को सोच बदलने की आवश्यकता है।
- अनिता सिंह ने कहा कि महिलाओं को चुनौतियों से निबटने के लिए बच्चों में बचपन से संस्कार की आदत माता-पिता को डालने की जरूरत है। इसके अलावा सही व गलत का एहसास कराते हुए खुलकर बात करने की आवश्यकता है, ताकि उसके अंदर सही और गलत का ज्ञान हो सकें।
- शिक्षिका बबली मिश्रा ने बताया कि महिलाओं को मां-बाप द्वारा भेदभाव करके बचपन से जिम्मेदारी दी जाती है। जिससे उनका पीछा जीवन भर नहीं छूटता है। लेकिन बिना भेदभाव के समान शिक्षा व समान जिम्मेदारी बच्चों के अंदर देने की आवश्यकता है। अगर लड़कियां गृहणी का कार्य कर सकती है तो लड़के क्यों नहीं? इस खाई को मां-बाप द्वारा पाटना होगा।
- नेहा सिंह ने कहा कि समाज में हो रहे माता-बहनों पर अत्याचार के लिए शिक्षा, संस्कार के साथ ही रूढ़िवादिता भी जिम्मेदार है। इसके लिए समाज के लोगों को महिलाओं के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी। अगर कोई लड़की लड़कों के साथ खेलती है या कहीं जाती है तो उस पर परिवार के सदस्य तो कम पड़ोसी ज्यादे उंगली उठाने लगते है। इस गंदी सोच को बदलना होगा।
- शिक्षिका सोनमपुरी का कहना है कि महिलाओं व छोटी बच्चियों के साथ हो रहे दुराचार के मामले में कोर्ट में तीवग्रति से सुनवाई करने की आवश्यकता है। ताकि पीड़िता व उसके परिवार को समय रहते न्याय मिल सकें। किसी व्यक्ति पर थोड़ी सी खरोच आ जाती है तो कितना दर्द होता है। उसी प्रकार जिस महिला या बच्ची के साथ दुराचार होता है तो उसे कितना दर्द सहन करना पड़ता होगा।
- शिक्षिका विभा पांडेय ने कहा कि महिलाओं के चुनौतियों का सामना शिक्षा व संस्कार रूपी हथियार से ही किया जा सकता है। जिसे बचपन से बच्चों को देना चाहिये। कहा कि लड़का व लड़कियों के खाई को पाटने के लिए कालेज व विद्यालयों में एक साथ शिक्षा देने की आवश्यकता है। उन्होंने अमर उजाला के इस अभियान को प्रत्येक गांव में प्रधान के माध्यम से अशिक्षित महिलाओं व युवतियों को एकत्रित कर जागृत करना चाहिए।
- खुशबू पांडेय ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए नगर ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी सरकार द्वारा आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षण देना चाहिये। ताकि वे मुश्किल की घड़ी में अपनी रक्षा कर सकें। इसके अलावा लड़के-लड़कियों के भेदभाव को मिटाना होगा और अपनी सोच को बदलना होगा। तभी माताएं-बहनें सुरक्षित रह पाएंगी।- शिक्षिका सुमन पांडेय का कहना है कि न्यायालय दोषी को सजा देने में काफी समय लगा देता है। जिसके कारण अपराधी इस दौरान पीड़ित परिवार को समझौता करने के लिए भयभीत करते है। पुलिस, न्याय, समाज के लंबे समय खींचने के कारण पीड़ित परिवार को मजबूरी में समझौता करना पड़ जाता है। इसके लिए न्याय प्रक्रिया में तेजी लाना होगा। इसके अलावा लोगों को महिलाओं के प्रति अच्छी सोच रखनी होगी।