लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 113वीं जयंती की पूर्व संध्या पर लोक स्वातंत्र्य संगठन (पीयूसीएल) की ओर से टाउन हाल बापू भवन में सभा और विचार गोष्ठी की गई। वक्ताओं ने जेपी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का शुभारंभ लोकनायक के चित्र के सामने दीप जलाकर और पुष्पार्चन से हुआ।
इस दौरान भूमि अधिग्रहण कानून और आम आदमी विषयक गोष्ठी आयोजित की गई। वक्ताओं ने केंद्र सरकार की आेर से लाए गए भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन की घोर आलोचना की। इसको किसान विरोधी बताया। कहा कि अगर बिल पास हो जाता तो न्यायालय में इसके खिलाफ अपील भी नहीं कर सकते।
प्रकाश डालते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर डा. रमेश दीक्षित ने कहा कि सरकारें देश के गरीब मजदूरों की जमीन हड़पने का कुचक्र रच रही हैं। किसानों की जमीन उनकी तकदीर होती है लेकिन भारत सरकार उसे नए कानून के माध्यम से छीनकर औद्योगिक घरानों को बेचने में लगी हुई है। ऐसे में देश की तकदीर कैसे बदलेगी।
वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में अध्यादेश के माध्यम से रेलवे, रक्षा, विद्युत, हाईवे, विकास के लिए किसानों की जमीनों का अधिग्रहण करने के लिए जो बिल लाया गया, उसे मोदी सरकार संसद में बिना चर्चा कराए पास कराना चाहती हैं। इसके पास हो जाने से हम न्यायालय में भी चुनौती नहीं दे सकते थे।
जिसकी कृषि योग्य भूमि अधिग्रहित की जाती, वह इसकी चुनौती न दे सके इसके लिए सरकार प्रयासरत थी। लेकिन संसद में आम सहमति न बनने से सरकार के मंसूबों पर पानी फिर गया। गोष्ठी में लखनऊ से आई पीयूसीएल की प्रदेश महासचिव वंदना मिश्रा ने कहा कि केंद्र सरकार की नीयत सही नहीं है। 1894 में अंग्रेजों द्वारा बनाया भूमि अधिग्रहण कानून किसानों की जमीनों को हड़पने की साजिश थी।
उसी तरीके का कानून केंद्र लाना चाहता है। केंद्र सरकार द्वारा इसमें किया गया संशोधन पूजीपतियों और औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया है। गाजियाबाद में किसानों की मंहगी कृषि योग्य भूमि विकास प्राधिकरण ने 850 वर्ग मीटर की दर से खरीदकर उसे 35 हजार रुपए वर्ग मीटर बेचकर मुनाफा कमा रही है।
बीएचयू के शोध छात्र प्रवीण कुमार सिंह ने कहा कि भारत में प्राकृतिक संसाधनों का प्रचुर भंडार है लेकिन केंद्र और प्रदेश सरकार केवल किसानों का दोहन करने में जुटी हैं। कामरेड केएन उपाध्याय ने कहा कि जेपी के नेतृत्व में साम्राज्यवाद के खिलाफपहली लड़ाई लड़ी गई।