बलिया। होलाष्टक शुरू हो गए हैं। होलाष्टक आठ दिन के होते हैं। जो 18 मार्च को समाप्त होंगे। इस दौरान कोई भी मांगलिक कार्य करना निषेध होगा। होलाष्टक के साथ मौसम परिवर्तन शुरू हो जाता है। व्यक्ति के रोग की चपेट में आने की संभावना रहती है।
थमहनपुरा निवासी ज्योतिषाचार्य पंडित अखिलेश उपाध्याय के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से पूर्णिमा तिथि तक होलाष्टक माने जाते हैं। होलाष्टक शब्द होली व अष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है। इसका अर्थ होता है होली से पहले के आठ दिन। उनका कहना है कि होलाष्टक के समय सभी ग्रह उग्र स्वभाव में होते हैं। इसलिए इस दौरान जो शुभ कार्य किए जाते हैं। उनका उत्तम फल प्राप्त नहीं होता है। इसलिए मांगलिक कार्य करना निषेध माना जाता है। होलाष्टक मौसम में बदलाव के द्योतक भी हैं। पंडित उपाध्याय ने बताया कि शास्त्रानुसार होलाष्टक के साथ मौसम परिवर्तन शुरू हो जाता है। सूर्य का प्रकाश तेज हो जाता है। हवाएं भी ठंडी रहती हैं। ऐसे में व्यक्ति रोग की चपेट में आ सकता है। व्यक्ति की मन की स्थिति अवसाद ग्रस्त रहती है।
इसलिए माना जाता है अशुभ
पौराणिक कथा के अनुसार राजा हिरण्यकशिपु अपने बेटे प्रहलाद को भगवान विष्णु के भक्ति से दूर रखने के लिए आठ दिन तक कठिन यातनाएं दी थीं। आठवें दिन हिरण्यकशिपु की बहन होलिका प्रहलाद को जलाने के लिए गोद में लेकर बैठी थी। लेकिन भगवान विष्णु के आशीर्वाद से भक्त प्रहलाद बच गए और होलिका जल गई थी। इसलिए होलाष्टक को शुभ कार्य करने के लिए अशुभ माना जाता है। होलाष्टक में व्रत, पूजन व दान करना विशेष फलदाई होता है। ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है। व्यक्ति को श्री सूक्त विष्णु सहस्रनाम, हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र का जाप नियमित करना चाहिए। इस साल होलाष्टक 10 मार्च से शुरू हो गए हैं। होलाष्टक 18 मार्च को समाप्त हो जाएंगे। होलिका दहन 17 मार्च को है, उसके अगले दिन 18 मार्च को रंग वाली होली मनाई जाएगी।
अंग्रेजी कैलेंडर से 18 को होली, हिन्दू पंचांग से 19 मार्च को
बलिया। रंगोत्सव यानी होली का त्योहार इस बार अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक, 18 को और हिन्दू पंचागों के हिसाब से 19 मार्च को है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, 17 मार्च को होलिका दहन व 18 मार्च को होली मनाई जाएगी। इसी दिन कार्यालयों में छुट्टी भी रहेगी। वहीं, अगर बात करें हिंदू पंचांगों की तो होली चैत्र मास कृष्ण पक्ष सूर्योदय व्यापिनी प्रतिपदा में मनाई जाती है, जो 19 मार्च को है। इस दिन प्रतिपदा दिन में 12 बजकर 13 मिनट तक है। ऐसे में हिंदू पंचांगों के अनुसार, होली मनाने के लिए 19 मार्च का दिन ही प्रशस्त माना जाएगा। पंडित अखिलेश उपाध्याय के अनुसार, 17 मार्च को सूर्योदय छह बजकर तीन मिनट और चतुदर्शी तिथि का मान दिन में एक बजकर दो मिनट तक पश्चात संपूर्ण दिन और रात्रि पर्यंत पूर्णिमा है। यह पूर्णिमा दूसरे दिन 18 मार्च को दिन में 12 बजकर 52 मिनट तक है। 17 मार्च को दोपहर एक बजकर दो मिनट से रात 12 बजकर 57 मिनट तक भद्रा भी है। पूर्णिमा तिथि के पूर्वार्द्ध में भद्रा का निवास होता है। होलिका दहन के विषय में कहा गया है कि होलिका दहन, भद्रा रहित पूर्णिमा की रात में ही किया जाए। दिन में चतुर्दशी या प्रतिपदा में होलिका दहन निषेध है। इसलिए इस वर्ष होलिका दहन 17 मार्च की रात्रि 12 बजकर 57 मिनट के बाद और 18 मार्च को सूर्योदय (छह बजकर दो मिनट) से पूर्व ही मान्य रहेगा।
स्वदेशी व प्राकृतिक रंगों का करें प्रयोग
बलिया। होली खुशी, उमंग और रंगों का त्योहार है। लेकिन होली पर कठोर और हानिकारक रसायन युक्त रंग आपकी बालों, आंखों व त्वचा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इससे सावधानीपूर्वक बचा जा सकता है। डाक्टरों की माने तो चाइनीज कैमिकल रंग व अबीर- गुलाल की बजाय स्वदेशी प्राकृतिक रंग व अबीर गुलाल का प्रयोग करें। इसके अलावा चाइनीज खाद्य पदार्थ के भी सेवन से भी बचने की सलाह दी है।
होली त्योहार में महज सात दिन शेष रह गया है। होली को लेकर नगर से लेकर ग्रामीण क्षेत्र के बाजारों में रंगों और पिचकारी की दुकानें सज कर तैयार हो गई है। लेकिन खरीदारी करने के दौरान सावधानी बरतने की नितांत आवश्यकता है। कारण कि बाजारों में कठोर व हानिकारक रसायन युक्त रंग उपलब्ध है। ऐसे में सावधानी पूर्वक रंगों की खरीदारी नहीं की गई तो रंग मस्ती में भंग डाल सकता है। इसके अलावा रंग खेलने के दौरान भी सावधानी रखने की आवश्यकता होगी। ताकि आंख, त्वचा व बाल को नुकसान न हो सकें। थोड़ी सी लापरवाही आपके उमंग भरी मस्ती में काफी नुकसान पहुंचा सकती है। जिला चिकित्सालय में तैनात चर्मरोग चिकित्सक दीपक गुप्ता की माने तो बाजारों में रसायन युक्त रंग व अबीर में कुछ घातक धातु ( मरकरी) मिलाकर बिक रहा है। इस रंग के बजाय प्राकृतिक रंगों का प्रयोग लोगों को करना चाहिये। अन्यथा की स्थिति में विभिन्न तरह के एलर्जी हो सकते है। जैसे छोटे-छोटे दाने निकलना, जलन होना आदि शामिल है। कहा कि रंग खेलने के पहले शरीर में नारियल व तिली का तेल लगाना चाहिये। जलन होने पर नारियल तेल में कपूर डालकर इस्तेमाल करना चाहिये। इसके साथ ही चर्मरोग विशेषज्ञ से मिलना चाहिये। वहीं जिला अस्पताल में तैनात नेत्र चिकित्सक डा. एस प्रसाद ने बताया कि आंख में रंग या गुलाल पडऩे पर तत्काल ठंडे पानी से धोए और नेत्ररोग विशेषज्ञ से सलाह लेकर दवा डालें। दुकान से दवा लेकर आंख में कत्तई ना लें, अन्यथा आंख चौपट हो सकती है। उन्होंने रसायन युक्त की जगह प्राकृतिक रंग व अबीर का प्रयोग करने की सलाह दी।