जीवनदायनी गंगा की प्राण वायु गर्मी आते ही सूखने लगती है। गंगा नदी की अविरल धारा को सूर्य की तपिश ने बदल दिया है। हालात यह है कि जगह-जगह टापू बन गए। परवल की खेती के लिए पहले किसान नौकायन करते थे, लेकिन अब उन्हें गर्म बालू के रेत से होकर गुजरना पड़ रहा है।
इतना ही नहीं जो किसान गंगा के पानी से अपनी खेतों की सिंचाई कर परिवार का पेट पालता था, अब उन्हें सिंचाई के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। ऐसा इसलिए हो रहा है कि नदी का पाट कम होता जा रहा है। नदी के सिकुड़ने से केवल किसान ही प्रभावित नहीं है, बल्कि केवट और मल्लाहों पर भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। यह पहले नौकायन करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। अभी पूरी गर्मी बाकी है, लेकिन स्थिति यही है कि गंगा सूखी नदी की तरह दिखने लगी है।
जनपद में 84 किमी में फैली गंगा सिकुड़ती जा रही है। कहीं-कहीं नदी का पाट नाले के समान हो गया है। इसका हालत बयां करने के लिए यही काफी है कि गंगा नदी में इन दिनों जलकुंभी तक जमा है। गंगा स्वयं कराह रही है।
इन दिनों जिला मुख्यालय से सटे शिवपुर दियर, प्रानपुर के साथ ही उमरपुर दियर, नौनीजोर, गोपालनगर दियारा आदि में गंगा नदी काफी सूख चुकी हैं। यहां खेती करने वाले किसानों को एक किमी से अधिक दूरी तय कर सब्जी आदि के लिए नदी से पानी लाना पड़ता है।
पहले नौकायन कर किसान खेतों में जाते और आते थे। लेकिन पाट कम होने तथा नदी के सिकुड़ने से हालत बदल चुके हैँ। इन नौकायन कर के पेट पालने वाले मल्लाहों के सामने भी भुखमरी की स्थिति है। कई किमी में गंगा के किनारे जलकुंभी देखा जा रहा है।
जबकि आमतौर पर यह तालाबों और गड्ढों में पाया जाता है। नदी के छोटे होते पाट, नदी के बीच में रेत के बनते टिले, पानी का कम होना, प्रदूषित जल का होना और अविरल धारा का कम होना यही संकेत देता है कि गंगा के आने वाले दिन अशुभ है।
पानी कम होने से गंगा नदी में मछुआरों की नाव भी सुचारू रूप से नहीं चल पा रही है। उनको ले जाने और ले आने में पानी के अभाव में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। जलीय जीव भी विलुप्त होती जा रही है। गंगा को बचाने का काम सही ढंग से नहीं हुआ तो गंगा नदी भी विलुप्त हो सकती है। गंगा में गाद व सिल्ट की सफाई की बात करना भी बेमानी हो गया है।