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बाढ़ और कटान...नहीं मिला अभी तक समाधान

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जनपद गंगा और सरयू दो नदियों की हर साल तबाही झेलने वाला जिला है। हर साल यहां लगभग 10 लाख की आबादी बाढ़ और कटान से तीन माह तक परेशान रहती है। कभी गंगा गांवों के अस्तित्व को मिटाने पर अमादा हो जाती है तो कभी सरयू के चलते कई इलाकों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। हालांकि वर्तमान सरकार ने इस स्थिति को महसूस किया। बाढ़ और कटान से राहत दिलाने के कुल 12 नई परियोजनाओं के लिए 92 करोड़ रुपये आवंटित किए। इसके बाद भी कई स्थानों पर समय पर कार्य पूर्ण करने में सिंचाई विभाग विफल रहा।
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बलिया। गंगा और सरयू की बाढ़ झेलने वालों की पीड़ा सिर्फ उसके प्रभावित लोग ही समझ सकते हैं। ऐसा नहीं है कि अधिकारियों और सियासी लोगों को ये नहीं दिखता। इसके उपाय तो खूब होते हैं...योजनाएं बनतीं हैं, रुपये पानी में बहते हैं । लेकिन किसी ने शिद्दत से इन समस्याओं का दूर करने का प्रयास नहीं किया। नतीजा बाढ़ और कटान की समस्या ने कई गांव मिटा दिए तो वहीं हजारों लोगों को बेघर कर दिया। सच तो ये है कि अपने प्रचंड वेग में से नदियां घर और खेत नहीं काटती बल्कि लोगों का कलेजा काटती है।
अब इस बार की ही बात ले लें इन नदियों से जिले में सबसे ज्यादा तबाही दूबेछपरा और सिताबदियारा क्षेत्र में देखने को मिली। प्रभावित इलाके के लोगों ने बताया कि ऐसा नहीं है कि योजनाएं नहीं बनती या धन खर्च नहीं होता। सिंचाई विभाग यदि काम समय से और सही तरीके से कार्य करा देता तो इतनी तबाही नहीं होती। काम तब शुरू होता है जब या तो बाढ़ आ चुकी होती है या आने वाली होती है। अगर समय से काम विभाग करवा भी दें तो उसकी गुणवत्ता इतनी खराब होती है कि एक बाढ़ को भी नहीं झेल पाती । इस बर दूबे छपरा के समीपवर्ती गांव उदयी छपरा में 26 लोगों के मकान गिर गए।
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जेपी की जन्मस्थली व चंद्रशेखर की कर्मस्थली में हर वर्ष मचती है तबाही
बलिया। विकास खंड मुरली छपरा के सिताबदियारा क्षेत्र की 40 हजार आबादी के दो पंचायतों के उत्तरी छोर पर सरयू नदी तो दक्षिणी छोर पर गंगा नदी बहती हैं। इन गांवों के लोग वर्षो पूर्व से गंगा व सरयू नदी के कटान व बाढ़ का दंश झेलते चले आ रहे हैं। बीते करीब एक दशक में इस आबादी के करीब 80 फीसदी किसान इन नदियों की कटान के चपेट में आकर भूमिहीन भी हो चुके हैं तो करीब 350 परिवार नदी की कटान से बेघर भी हो चुके हैं। करीब सात वर्ष पूर्व कटाव रोधी कार्य शुरू कराया गया जो आज भी अधूरा है।
बता दें कि सिताबदियारा समाजवाद के पुरोधा जयप्रकाश नारायण की जन्म स्थली है तो वहीं पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की कर्मस्थली रही है। जनपद के पूर्वी छोर पर सिताबदियारा गांव की भौगोलिक स्थिति यह है कि इसमें कुल चार पंचायतें आती हैं। दो पंचायत यूपी में तो दो पंचायत बिहार राज्य की सीमा में पड़ती हैं। उत्तर प्रदेश व बिहार दोनों राज्यों के चार पंचायतों के बाशिंदे गंगा व घाघरा नदी के कटान व बाढ़ का दंश करीब एक दशक पूर्व से झेलते चले आ रहे हैं। इससे सुरक्षित करने के लिए दोनों राज्यों के सरकारों के काफी मशक्कत के बाद वर्ष 16-17 में बाढ़ खंड द्वारा सुरक्षा रिंग बांध निर्माण कराने का निर्णय लिया गया। जिससे ये चारों पंचायतें सदा के लिए सुरक्षित हो जातीं। इस बांध की कुल लागत करीब 130 करोड़ रुपये की स्वीकृति बनी जिसमें चारों पंचायतों के तीन तरफ से कुल चार किमी की दूरी में रिंग बांध का निर्माण होना था। इसमें बिहार राज्य की सरकार ने अपनी सीमा के लिए 2018 में ही 8599.30 करोड़ रुपये की स्वीकृति दे दी और बिहार सरकार द्वारा अपनी सीमा में वर्ष 18-19 में ही सुरक्षा बांध निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया। लेकिन यूपी की सीमा में निर्माण होने वाला सुरक्षा बांध जो गंगा किनारे 2300 मीटर व घाघरा किनारे 1175 मीटर में कुल 40.4976 करोड़ रुपये से होना था आज भी अधूरा है।
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129 करोड़ से गंगा की धारा मोड़ने का कार्य भी अधूरा
कटान को लेकर ज्यादा चर्चा में दूबे छपरा रिग बांध रहा है। यहां पहली बार 27 अगस्त 2016 को यह रिग बंधा टूट गया था। लगभग 40 हजार की आबादी जलमग्न हो गई थी। उसके बाद 29 करोड़ के कटानरोधी कार्य को मंजूरी मिली। कार्य पूरा हुआ लेकिन 16 सितंबर 2019 को रिग बंधा दोबारा टूट गया। उसके अगले दिन 17 सितंबर 2019 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौके पर पहुंचे। आश्वासन दिए कि यहां नदियों की धारा को मोड़ने के लिए काम किया जाएगा। 129 करोड़ से रामगढ़ से ही गंगा की धारा को दूसरी दिशा में मोड़ने के लिए एक साल से ड्रेजिग कार्य हो रहा है, लेकिन उसकी गति भी धीमी है।
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गंगा का जलस्तर बढ़ते ही ग्रामीणों की बढ़ जाती है चिंता
बैरिया। बाढ़ प्रभावित गांवों के लोग दुबेछपरा रिंग बंधा को दुरुस्त करने व गांवों को बचाने को लेकर पिछले एक दशक से समय-समय पर आंदोलन करते रहे हैं। रिंग बंधा के करीब बसे केहरपुर, दुबेछपरा, गोपालपुर, प्रसाद छपरा, बुधनचक, मुरलीछपरा के लोग इसे सालों मुद्दा बनाए हुए हैं लेकिन आज भी स्थिति ज्यों की त्यों है। आलम यह है कि जब-जब गंगा का जलस्तर बढ़ा है तब-तब यह बांध टूटा है और गांव के लोगों की आवाज को दबाई जाती रही है।
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