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शहरों में गांव लौटे प्रवासियों के सामने रोजी रोजगार का संकट

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बैरिया। सरकार की तमाम योजनाओं के बावजूद प्रवासी मजदूरों के सामने आर्थिक संकट पैदा हो गया है। गांव व जिले में काम नहीं मिल रहा है। पढ़े लिखे प्रवासियों को मनमुताबिक काम न मिलने से नौकरी की सबसे अधिक संकट खड़ा हो गया है। कोरोना संक्रमण की स्थिति शहरों में भयावह है।
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करमानपुर के पिंटू गिरी ने बताया कि कोलकाता में काम करते थे। लॉकडाउन से काम छूट गया है। गांव पर खेत बारी भी नहीं है किसी तरह से काम चल रहा है। गांव व जिले में नौकरी नहीं मिल रहा है जिससे बच्चों का इलाज और भोजन के लिए सबसे बड़ी समस्या खड़ी हो गई है।
करमानपुर निवासी श्याम सुंदर गुप्ता रांची में काम करते थे। तीन बच्चे हैं पत्नी हैं मां-बाप है परिवार चलाना बहुत मुश्किल हो गया है। काम छूट जाने से गांव आकर बैठे हैं इनके सामने परिवार चलाने की संकट पैदा हो गयी है।
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तालिबपुर निवासी राकेश तिवारी उड़ीसा में गाड़ी चला रहे थे, अब काम छूट गया है घर आ गए हैं। गांव पर ने तो खेती है और न ही कोई रोजगार ही मिल रहा है। कहा कि ऐसे में घर चलाना बहुत मुश्किल हो गया है। दो लड़के पत्नी और स्वयं का खर्च चलाने को लेकर चिंता है।
श्रीकांतपुर अंतर्गत देवी चौधरी के हाता निवासी अविनाश यादव बीएड पास हैं। जिला मुख्यालय पर कोचिंग चला रहे थे जो कि बंद पड़ा है और घर पर रह रहे हैं। लॉकडाउन में शिक्षण संस्थान बंद हो जाने के कारण बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
मधुबनी निवासी सर्वजीत कुमार मौर्य बंगाल के बनकुंडा में पावर प्लांट में नौकरी करते थे। लॉकडाउन में काम छूट गया तो गांव आ गए। गांव में मनरेगा के तहत मिट्टी ढोने का काम मिल रहा है। ऐसे में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद मिट्टी ढोना नागवार लग रहा है और शहरों में कोरोना फैल रहा है। जिससे घर गृहस्थी चलाने की चिंता बढ़ गई है।
करमानपुर निवासी मोहित गुप्ता इलाहाबाद में कोचिंग चलाते थे लेकिन कोचिंग बंद हो गई और गांव आ गए। अब इनके सामने रोजी रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। गांव व जिले में मनमुताबिक नौकरी नहीं मिल रहा है।
तालिबपुर निवासी धर्मवीर मौर्य ने बताया कि दिल्ली में खाना खाने वाला प्लेट बनाने का काम करता था जिससे परिवार का खर्च ठीक से निकल जाता था। लेकिन लॉकडाउन के बाद गांव आ गया और अब बेरोजगार बन गया हूं। घर का चूल्हा कैसे जलेगा संकट हो गया है।
तालिबपुर निवासी पंकज कुमार मौर्या का कहना है कि बीएससी कृषि से कृषि स्नातक तक पढ़ाई करने के बाद हरियाणा में गाड़ी का मीटर बनाने का काम करता थ। लॉकडाउन में काम धंधा छूट गया और गांव आया। यहां पर मिट्टी, बालू का काम के अलावा कोई काम मिलता नहीं है, जिससे आर्थिक स्थिति चरमरा गई है।
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