बलिया। जिले में प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाले ददरी मेला के अस्तित्व को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। धीरे-धीरे करते हुए पिछले 15 सालों में ये मेला अब उस स्थान से लगना प्रारंभ हो रहा है, जहां कभी ये समाप्त हो जाता था। यह स्थिति आई है, मेला क्षेत्र में स्थित जमीनों के लगातार बिकने और उन पर आवास-दुकान आदि बनने के कारण। जबकि ये इलाका बंधे के दूसरी तरफ (डूब क्षेत्र) है और उधर पक्का निर्माण पर पूर्णतया रोक है। इसे लेकर ध्रुवजी सिंह सेवा स्मृति सेवा संस्थान के सचिव भानु प्रकाश सिंह बबलू ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही प्रदेश के दोनों उपमुख्यमंत्री, जिले के सभी सांसद, सभी विधायक, केंद्रीय पर्यटन व संस्कृति मंत्री, राज्यपाल, नगर विकास मंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव नगर विकास, पर्यटन व संस्कृति निदेशक सूचना व संस्कृति, मंडलायुक्त आजमगढ़, जिलाधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी, अपर जिलाधिकारी, सिटी मजिस्ट्रेट, व एसडीएम सदर को पत्र भेज मेला की जमीन का अधिग्रहण करने की मांग की है, ताकि उसके अस्तित्व को बचाया जा सके।
पत्र में सिंह ने लिखा है कि पौराणिक काल से महर्षि भृगु द्वारा गंगा नदी की जलधारा को समृद्ध बनाये रखने हेतु शिष्य दर्दर मुनि के नेतृत्व में भृगु संहिता के लोकार्पण की स्मृति में ददरी मेला का शुभारंभ किया गया था। इस मेला को लगाने के लिए पिछले सैकड़ों वर्षों से बलिया शहर के दक्षिणी सीमा पर गंगा नदी के छाड़न बालेश्वर घाट (शनिचरी मंदिर) से जमुवा गोपालपुर तक नदी के डूब क्षेत्र में प्रतिवर्ष लगभग 130 एकड़ भूमि अधिग्रहीत की जाती है। इसके एवज में किसानों को नगर पालिका बलिया की ओर से मुआवजा भी दिया जाता है।
वर्तमान में भू स्वामियों द्वारा मेला क्षेत्र की जमीनों का विक्रय निरन्तर किया जा रहा है। खरीदारों द्वारा कृषि कार्य न कर बगैर भूमि की नवीयत परिवर्तन कराये विनियमित क्षेत्र एवं नगर पालिका परिषद् की मिलीभगत से डूब क्षेत्र में निर्माण निषेध होने के बावजूद निरंतर आवासीय भवनों का अवैध रूप से निर्माण किया जा रहा है। इसके कारण मानव जीवन के सभी पक्षों को समेटने वाले इस पौराणिक ददरी मेला की भूमि संकुचित होती जा रही है। हाल ये है कि इस समय यह मेला वहां से प्रारंभ ही हो रहा है, जहां लगभग 15 वर्ष पहले ये मेला समाप्त हुआ करता था। इससे इस प्राचीन मेला के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में शासन स्तर से इस मेला की भूमि का स्थाई रूप से प्रबन्ध/अधिग्रहण करने की नितांत आवश्यकता है, ताकि भारतीय परम्पराओं व संस्कृति की इस अमूल्य धरोहर को अक्षुण्ण रखा जा सके।
...तो उच्च न्यायालय में दाखिल करेंगे याचिका
पत्र को लेकर जब अमर उजाला ने ध्रुवजी सिंह स्मृति सेवा संस्थान के सचिव भानु प्रकाश सिंह बबलू से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि पत्र सभी को भेज दिया गया है। अब उनके जवाब का इंतजार है। यदि जवाब नहीं आता है तो 15 दिन बाद एक बार फिर पत्र भेजा जाएगा। उन्होंने बताया कि सभी को पत्र रजिस्ट्री डाक के माध्यम से भेजा गया है। दूसरे पत्र का भी जवाब नहीं मिलने के बाद उच्च न्यायालय की शरण में जाएंगे। सिंह ने बलिया के सभी जनप्रतिनिधियों से अपील की है कि इस ऐतिहासिक महत्व के मेला के अस्तित्व को बचाने के लिए आगे आएं।
देश का दूसरा सबसे बड़ा पशु मेला भी है ददरी
सभी को भेजे पत्र में सिंह ने मेला की ऐतिहासिकता को लेकर भी जानकारी दी है। उन्होंने बताया है कि इस बहुआयामी ददरी मेला में संत-महात्मा संगम पर पुरे कार्तिक मास तक कल्पवास करते हैं। इसी दौरान संत समागम व भृगु क्षेत्र की पंचकोषी परिक्रमा यात्रा भी होती है। कार्तिक पूर्णिमा पर लाखों श्रद्धालुओं के स्नान के साथ ही महीने भर चलने वाला ददरी मेला प्रारम्भ होता है। ऐतिहासिक मेला के मीना बाजार के बीचोबीच स्थापित कलामंच से नवम्बर 1984 में महान कवि भारतेंदु हरिश्चद्र ने भारतवर्षोन्नति कैसे हो पर प्रसिद्ध व्याख्यान दिया था। इसके बाद इस मंच का नाम ही भारतेन्दु कला मंच रख दिया गया। अब तक इस पर होने वाले अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में विश्व स्तर के कलाकार, कवि व साहित्यकार शिरकत कर चुके हैं। इस मेला की पहचान देश के दूसरे सबसे बड़े पशु मेला के रूप में भी है, जिसका जिक्र चीनी यात्री फाह्यान द्वारा अपनी पुस्तक में किया गया है।