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हीरे-मोती से सजाया जाता है ताजिया

Sun, 25 Nov 2012 12:00 PM IST
Ballia
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बलिया। मोहर्रम पर्व पर नगर से सटे मिड्ढा गांव का ऐतिहासिक ताजिया अपने आप में कौमी एकता का मिसाल है। इसे देखने के लिए दूर-दराज के लोग प्रत्येक वर्ष यहां पहुंचते हैं। यहां का ताजिया कई पीढ़ियों से उठता चला आ रहा है। ताजिए की खासियत यह है कि इसे हीरे और मोती से सजाया जाता है। इसमें दर्जनों हिंदु शामिल होते हैं। ताजिया को पुराने जमाने की लरी और हीरे-मोतियों से सजाया जाता है, जो अपने आप में आकर्षण का केंद्र है। कभी मिड्ढा गांव में कुल 11 ताजिया उठाई जाती थी, लेकिन धीरे-धीरे कम होती गई। अब मात्र तीन ताजिया ही गांव से उठाई जाती हैं।
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नगर से सटे मिड्ढा गांव में कई पीढ़ियों से ताजिया उठती चला आ रहा है। सबसे पहले पश्चित टोला स्व. दिलदार महरूम ने ताजिया उठाने का काम किया। उसके बाद उसका संचालन उनके परिवार के सदस्य शब्बीर अंसारी कर रहे हैं। इसके बाद स्व. गुल मुहम्मद ने ताजिया उठाया, जो कई दशकों से बंद है। पूरग टोला के डा. मसीहुजमा अंसारी ने उठाया। वह भी परिवार जनों की आपत्ति पर करीब एक दशक से बंद हो गया है। पश्चिम टोला के स्व. मु. शरीफ महरूम ने उठाया। जिसका संचालन परिवार के सदस्य इब्राहिम पेंटर द्वारा किया जाता है। पूरब टोला के स्व. खोदाद्दीन ने ताजिया उठाया। जिसका संचालन उनके परिवार के सदस्य महमूद आलम द्वारा किया जाता है। किसी कारणवश इस वर्ष नहीं उठाया गया। उत्तर टोला बाजार में स्व. रोजुद्दीन शाह ने उठाया। जिसका संचालन परिवार के सदस्य गौहर द्वारा किया जाता है। सातवीं ताजिया भी करीब तीन पीढ़ियों से बंद है। ताजियादार इब्राहिम पेंटर ने बताया कि मोहर्रम में हिंदू और मुस्लिम भाई सब मिलकर ताजिए को उठाकर गांव का भ्रमण कराते हैं। इसके साथ ही अखाड़े में दोनों समुदाय के लोग अपना करतब भी दिखाते हैं। बताया कि ऐतिहासिक ताजिए को देखने के लिए गैर प्रांतों समेत गैर जनपदों के लोग भी यहां आते हैं।
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