फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

एकही दुआ बा... बना दीं हमनी के ‘िबहारी’

Thu, 03 May 2012 12:00 PM IST
Ballia
विज्ञापन
विज्ञापन
मझौवां। अपने ही बाग में बेगाने हुए बागबां...। यह पंक्ति गंगा उस पार रहने वाले जनपद के 14 गांवों के हजारों लोगों पर सटीक बैठती है। कहने के तो यह लोग जिले में हैं पर यह लोग अपने घर में खुद को बेगाना महसूस कर रहे हैं। इस गांवों में रहने वाले लोगों के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रहीं सरकारी योजनाएं मात्र एक छलावा हैं। इनका सबसे बड़ा दुख है कि नदी पार रहने वाले इन लोगों को न तो यूपी सरकार अपना मानती है न बिहार की सरकार ही अपनाती है। यूपी बिहार की मझधार में फंस कर रह गए हैं यहां के लोग। मजे की बात तो यह है कि जब वोट लेने की बारी आती है तो जनप्रतिनिधि इन्हें अपना मानने लगते हैं। यूपी में उपेक्षा के दर्द से कसक रही आबादी बिहार निवासी बनने की दुआ मांग रही है।
विज्ञापन

जनपद का भौगोलिक क्षेत्र गंगा एवं घाघरा नदी से घिरा हुआ है। नदियों के धारा परिवर्तन के चलते जिले के 14 गांव नदी उस पार बिहार से सटे इलाके में जाकर बस गए। इनमें बैरिया तहसील के नौरंगा, भुवालछपरा, चक्की, उदईछपरा व दुबहर विकास खंड जवहीं, शिवपुर, ब्यासी, पांडेय डेरा, कृपा डेरा तथा रेवती ब्लाक के चकबिलियम आदि है। लेकिन सरकारी दस्तावेजों में यह गांव यूपी में आते हैं। लेकिन यूपी सरकार इन्हें अपना नहीं मानती है और न ही ये बिहार में अपना हक मांग सकते हैं। इन गांवों में बुनियादी सुविधा के नाम पर बिजली, पानी सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं भी मयस्सर नहीं हैं। विकास के नाम पर यहां के लोग अपने-आप को छला हुआ महसूस करते हैं। करीब 97000 की आबादी जिले की वासी होते हुए खुद को बेगाने महसूस करती है। यहां के बाशिंदों का कहना है कि यदि हमें बिहार प्रांत से जोड़ दिया जाए तो शायद हम विकास की मुख्य धारा से जुड़ जाएंगे क्योंकि अब हमें यूपी की सरकार से कोई उम्मीद नहीं है। यहां का शासन-प्रशासन हमें भूल गया है। सरकारी सुविधाएं तो दूर हमें मूलभूत सुविधाएं भी मयस्सर नहीं हो रही हैं। आज हमारी परिस्थिति ऐसी है कि न तो हमें पानी मिलता है न बिजली और न ही सड़क की ही सुविधा दी गई है। जबकि पड़ोस के गांवों में जो बिहार में आते हैं वहां मूलभूत सुविधाएं हैं और वहां की बिजली की रौशनी हम यूपी वासियों को मुंह चिढ़ाती है। यहां तक की प्रदेश में रह रहे हमारे सगे संबंधियों का खत भी हम तक नहीं पहुंच पाता। हम अपना जिला बलिया तो लिखते हैं लेकिन डाकघर का पिन कोड बिहार का देना पड़ता है। गांव के संजय पांडेय निराला मंजित कुमार, रंजीत ठाकुर, रमाकांत ठाकुर, राजेश यादव, विनय चौबे, मनोज यादव आदि लोगों का कहना है कि यह तो यह एक नौरंगा गांव की कहनी है ऐसे नौरंगा सहित 14 गांव है जहां की भी सेम स्थिति है। आलम यह है यदि कोई बड़ी वारदात हो जाती है तो भी जिले के आला अफसर नहीं पहुंच पाते हैं। यहां की जनता यह कहने से गुरेज नहीं करती कि यहां ना केहू के आना बा ना केहू के जाना बा। यहां सबकुछ भगवान भरोसे बा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें