जयप्रकाशनगर। प्रभु श्रीराम का आचरण चराचर के जीवों के कल्याण के लिए हुआ है । जब उस समय पापाचार बढ़ गया, यहां तक कि संतो और देवताओं के भी आचरण में भी पापाचार बढ़ने लगा तो आदि ब्रह्मा विष्णु ने श्रीराम के रूप में जहां स्वयंभू मनु के वंशज राजा दशरथ के पुत्र के रुप में पदार्पण हुआ। वहीं आदि शक्ति भगवती सीता विदेहराज जनक के घर में प्रकट हुई। यह बातें क्षेत्र के नरहरिधाम स्थित नरहरि मठ पर हो रहे श्री पराशक्ति महायज्ञ के छठवें दिन मानस प्रवीण मनोज शास्त्री ने प्रवचन के दौरान कही।
उन्होंने कहा कि दोनों ने पापियों के नाश करती हुई पति पत्नी के रुप में जगत में प्रचारित हुए , जहां प्रभु श्री राम ने पति के श्राप से श्रापित अहिल्या को पत्थर से नारी बना दिया तो, वही मां जानकी ने वर्षों एक स्थान पर पड़े देवाधिदेव शिव के असीम बलशाली धनुष को उठाकर उसके स्थान की सफाई कर डाली। जिसे जो धनुष पापियों के बल को मान मर्दन करने वाला था । जिसे महर्षि परशुराम के सिवाय दूसरा कोई भी हिला नहीं सकता था । उस धनुष को आदि शक्ति ने आसानी से उठा लिया , जिसे देखकर विदेह राज जनक ने धनुष यज्ञ की रचना कर डाली और घोषणा किया कि जो भी बीर इस धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ा डालेगा उसे सीता जो अतुलनीय सुंदरी थी उस वीर को अपने वर रूप में वरण करेगी । उस धनुष यज्ञ में चराचर के वीर राजाओं के साथ साथ त्रिलोक विजेता रावण भी पहुंचा था । लेकिन उस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर,हिला भी नहीं सके। फिर विदेह राज जनक के मान रखने के लिए महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा से प्रभु श्रीराम ने उस धनुष को उठाकर तोड़ डाला । उसी समय मां सीता वरमाला पहनाकर वर के रूप में प्रभु श्रीराम को वरण किया और वहीं से पापियों के विनाश का खाका तैयार होने लगा।