एक साल में पंचायती राज विभाग ने स्वच्छता जागरूकता के नाम पर 44 लाख खर्च कर दिया लेकिन एक भी स्वेछाग्रही शौचालय नहीं बनवा सक। स्वच्छता के नाम पर धनराशि की खूब बंदरबांट हुई। जबकि इन्हें शौचालय के प्रति लोगों में जागरूकता के लिए तैनात किया गया था।
स्वच्छ भारत मिशन के तहत जिले के गांवों को ओडीएफ करने के लिए एक साल पहले लोगों को जागरुक करने का प्रावधान किया गया। इसके लिए स्वेच्छाग्रही बनाने व उनके जरिए गांवों में ट्रिगरिंग कराने तथा शौचालय निर्माण के लिए लोगों को जागरुक करने का काम शुरु किया गया। विभागीय अधिकारी की मानें तो एक साल में कुल 380 स्वेच्छाग्रही को पांच दिवसीय प्रशिक्षण दिया गया और प्रशिक्षण के बाद टीमों के माध्यम से अलग-अलग गांवों में पांच दिनों तक ट्रिेगरिंग कराई गई।
पांच दिवसीय ट्रिगरिंग के एवज में तीन लाख 97 का भुगतान किया गया जबकि इनके प्रशिक्षण पर कुल 20 लाख का भुगतान किया गया है और 20 लाख भुगतान के लिए पत्रावली तैयार कर भुगतान करने की प्रकिया चल रही है। औसत देखें तो गांवों को खुले में शौच से मुक्त करने के लिए लोगों के जागरुक करने में विभाग की ओर से प्रति स्वेच्छाग्रही पर कुल 11 हजार 571 रुपये खर्च किए गए हैं।
इसमें गांवों में पांच दिवसीय ट्रिगरिंग के सापेक्ष प्रति स्वच्छाग्रही जहां 1044 रुपये खर्च हुए हैं वहीं प्रशिक्षण पर प्रति स्वच्छाग्रही 10527 रुपये खर्च किए गए हैं। इस भारी भरकम धनराशि खर्च किए जाने के बावजूद एक साल में एक भी स्वेच्छाग्रही की ओर से ग्रामीणों को जागरुक कर एक भी शौचालय निर्माण नहीं कराया जा सका है।