बलिया। संस्कृति विभाग भारत सरकार के सहयोग व दस्तक महिला बाल रंगमंच सामाजिक संस्थान के तत्वाधान में बुधवार की देर शाम टाउन हॉल में विदेसिया नाटक का मंचन किया गया। कलाकारों की प्रस्तुति देख लोग कभी हंसे तो कभी भावुक भी हुए। बतौर मुख्य अतिथि पूर्व बीएसए डॉ. राकेश सिंह व साहित्यकार डॉ. जनार्दन राय ने दीप जला कर शुभारंभ किया।
भिखारी ठाकुर रचित विदेसिया गांव के खेतिहर मजदूर की है जिसे वर्ष के कुछ ही दिनों काम मिलता है, शेष समय में बेरोजगार रहता है। उसकी शादी एक सुंदर युवती से हो जाती है। विवाह के कुछ दिनों बाद वह युवक अपनी पत्नी का गवना करा कर अपने घर ले आता है। वह अपनी पत्नी को प्यारी सुंदरी नाम से ही संबोधित करता है। कुछ दिन तो सुख-चैन से बीतते हैं, लंबी बेरोजगारी और बिगड़ती आर्थिक स्थिति युवक के मन-मस्तिष्क को बराबर परेशान करती रहती है। कुछ दिनों बाद युवक कलकत्ता जाकर मेहनत-मजदूरी कर कुछ धन कमाने और फिर घर लौटकर अपनी पत्नी प्यारी सुंदरी के साथ रहकर मौज-मस्ती करने की सोचता है। युवक अपनी पत्नी प्यारी सुंदरी से अपना कलकत्ता जाने का प्रस्ताव रखता है। युवती आशंकित एवं विचलित हो जाती है। वह इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध करती है। तब वह बहाना बनाकर घर से चुपचाप भाग कर कलकत्ता पहुंच जाता है। वहां जाकर वह विदेशी बन जाता है। दिन भर कड़ी मेहनत-मजदूरी कर धन कमाता है।
अचानक उसका परिचय एक युवती से हो जाता है। कुछ दिनों बाद दोनों पति-पत्नी के रूप में रहने लगते हैं। गांव में विदेशी की पत्नी प्यारी सुंदरी को जब यह बोध होता है कि उसका पति बिना उसकी सहमति के ही उसे अकेली छोड़कर कलकत्ता कमाने चला गया, तो उसके सिर पर जैसे विपत्तियों का पहाड़ ही टूट पड़ता है। वह दिन-रात कलपती रहती है। अचानक एक दिन एक अधेड़ बटोही, जो कमाने के लिए कलकत्ता जा रहा था, विदेसी की पत्नी प्यारी सुंदरी के विलाप से वह विचलित होता है और उसके पति को खोजकर वापस भेजने का आश्वासन देता है। कलकत्ता पहुंचने के बाद घूमने-फिरने के क्रम में बटोही की दृष्टि प्यारी सुंदरी के पति के बताए गए विवरण से मिलते-जुलते एक युवक पर दृष्टि अचानक पड़ जाती है और बटोही उसे समझता-बुझाता है। इसके बाद विदेशी घर वापस लौटने की बात सोचने लगता है। कलकत्ता में पत्नी बनी महिला बिदेसी के इस योजना का विरोध करती हैं, लेेकिन वह घर की राह पकड़ता है। बाड़ीवाला (मकान-मालिक), साहूकार और गुंडों द्वारा विदेसी के बकाए की बसूली में सब सामान एवं कपड़े छीन लिए जाते हैं, फिर भी, वह उसी अवस्था में घर लौटता है। बहुत विश्वास दिलाने पर और अपने पति की आवाज पहचान कर सुंदरी दरवाजा खोलती है और परदेशी पति को देखकर एक ओर प्रसन्न होती है, तो दूसरी ओर उसकी इस दशा पर आश्चर्यचकित होती है। नाटक का निर्देशन व प्यारी सुंदरी की भूमिका स्मृति निधि ने निभाई जबकि बटोही की भूमिका सुनील कुमार यादव, विदेश की भूमिका समीर खान ने निभाई। इसके अलावा अन्य कलाकारों प्रेम कुमार, पंकज, आदित्य, लक्की, पंकज बहादुर, अनुपम, काजल, दामिनी, प्रिया, विकास, दिलीप आदि ने भी अलग-अलग भूमिका निभाई।