बलिया। ब्रितानी साम्राज्य को बलिया में परास्त कर देने के बाद शासन संचालन के लिए 20 अगस्त को दोपहर बाद बाबू शिवप्रसाद गुप्त की कोठी पर प्रमुख नेताओं की बैठक हुई। सभी के सामने यह ज्वलंत सत्य भी दिख रहा था कि 12 दिनों की सफल बगावत के बाद केवल बलिया ही आजाद हुआ है। इसके आसपास या तथा चारों ओर ब्रिटिश शासन कायम था। ऐसे में शासन सत्ता का भार संभालना भी आग से खेलने और दुधारी तलवार के समान था। इन सारे पहलुओं पर विचार करने के बाद सर्वसम्मति से बलिया में प्रजातांत्रिक स्वराज सरकार की स्थापना और जिले की सड़कों तथा रेलमार्ग को भंग कर आजाद द्वीप बनाने का निर्णय हुआ। बैठक में प्रथम जिलाधिकारी के रुप में चित्तू पांडेय का चयन किया गया और हर गांव में पंचायत गठन करने का निर्णय लिया गया।
गांव स्तर पर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्वयंसेवकों की भर्ती करने और रात में पहरा देने की व्यवस्था बनाई गई। शाम को टाउन हाल में विशाला जनसभा आयोजित किया गया और जनसमूह के बीच नेताओं ने स्वराज सरकार के गठन चित्तू पांडेय को जिलाधिकारी बनाए जाने की घोषणा की गई। शहर की जनता ने तत्काल 2500 रुपए का चंदा भ्ज्ञी स्वराज सरकार चलाने के लिए दिया।
उधर, गरम दल अभी भी गरम ही था। उनका मानना था कि जिले के कुल 10 थाने में से सात पर ही जनता का अधिकार है और शेष तीन थानों पर अंग्रजों का झंडा लहरा रहा है। वह जिले की सीमा में मौजूद हर ब्रिटिश पहचान को मिटाने पर आमादा थे। शेष थानों पर अधिकार करने के लिए प. महानंद मिश्र, विश्वनाथ चौबे, पारसनाथ मिश्र, रामजी तिवारी को जिम्मेदारी दी गई। उभांव थाने से बलिया आ रहे पांच सिपाहियों को सिकंदरपुर मार्ग पर सुखपुरा के पास सुखपुरा निवासी रामकिशुन सिंह और नागेश्वर सिंह ने रोक कर क्षेत्रीय जनता के सहयोग से उनकी वर्दी उतरवाई और बंदूकें छीनकर उन्हें नंगे ही बलिया भेज दिया। दोपहर से ही जनता खुद सक्रिय थी और संवेदनशील माने जाने वाले बलिया-गाजीपुर और बलिया-मऊ मार्ग को सुरक्षा दृष्टि से जगह-जगह खोद दिया। इन मार्गों पर बने पुल को भी ध्वस्त कर दिया। आम लोग जहां खुशी से जशभन मना रहे थे वहीं ब्रितानी शासन में रौब गांठने वाले लोग अपना मुंह छिपाकर ही कहीं आ-जा रहे थे। अंग्रजी शासन के सभी सरकारी दफ्तर बंद हो गए थे।