बलिया। काश! ठेला दूकानदारों के आंदोलन पर प्रशासन ने सकारात्मक रुख अपनाया होता तो शायद ठेला दूकानदारों को यह कदम उठाने की नौबत नहीं आती।
नौ माह पूर्व तत्कालीन पुलिस अधीक्षक प्रभाकर चौधरी ने नगर को अतिक्रमण मुक्त और साफ-सुथरा रखने के लिए ठेला तथा पटरी दूकानदारों को चौक से हटवाया था। इसके बाद उन्होंने दूकानदारों के लिए दूसरा स्थान भी विकल्प के रूप में रखते हुए वहां पर दूकान लगाने को निर्देशित किया था। नगर के ओक्डेनगंज तिराहा से आर्यसमाज रोड पर फल की दूकानें लगने भी लगी थी। लेकिन दूकानदारों का आरोप था ओक्डेनगंज से आर्यसमाज रोड में दूकान लगाने के लिए उनसे अवैध वसूली की जाती है। इसकी शिकायत उन्होंने पुलिस के आला अफसरों से भी की, लेकिन निदान करने की जगह उसे टाला जाता रहा, जिससे ठेला दूकानदारों परेशान हो गए। इसी दौरान कई मर्तबा दूकानदारों ने जिलाधिकारी सहित जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर मांग किया कि उन्हें किसी उचित स्थान पर दूकान लगाने देने की मांग की। इसी क्रम में बीते 13 जून को शहीद पार्क के बाहर अपनी मांगों को लेकर दूकानदारों ने क्रमिक अनशन शरू किया।। फिर भी उनके आंदोलन को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। नतीजतन ठेला दूकानदारों ने विषाक्त पदार्थ खा लिया। ठेला दूकानदार बिट्टू पटेल, सरफुद्दीन, असगर अली, मनोज वर्मा, फैयाज अहमद का कहना है कि नौ माह से उनकी दूकान नहीं लग रही है, जिससे वह भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं। पुलिस की प्रताड़ना भी सहनी पड़ रही है। ऐसे में नगर के बीचो बीच बनकर तैयार लोहिया मार्केट को पटरी दूकानदारों के बीच आवंटित कर दिया जाए। प्रशासन और नगर पालिका उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेता है, जिससे उनका धंधा चौपट हो गया है।
धरना से लेकर भीख तक मांगी
बलिया। अपनी मांगों को लेकर क्रमिक अनशन पर बैठे ठेला दूकानदारों ने पांच दिनों में तरह-तरह के हथकंडे अपनाएं लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी। पहले दिन क्रमिक अनशन पर बैठने के बाद दूसरे दिन कलेक्ट्रेट पहुंचकर धरना प्रदर्शन किया। फिर भी किसी ने नहीं सुनी तो तीसरे दिन पुलिस प्रशासन की उदासीनता के विरोध में पुतला भी दहन किया। इस पर भी बात नहीं बनी ता चौथे दिन नगर में घूमकर भीख मांगकर प्रदर्शन तक किया।
सीसीटीवी कैमरा होता तो नजर में आ जाते उपद्रवी
बलिया। जिला चिकित्सालय में शनिवार को करीब 11.30 बजे अचानक उग्र रुप लिए ठेला दूकानदार और छात्रों ने तोड़फोड़ शुरु कर दिया। जिससे कि अस्पताल के चिकित्सक तो भयभीत थे ही भर्ती मरीजों के तीमारदार भी दहशत में रहे। अगर इमरजेंसी में लगा सीसीटीवी कैमरा चल रहा होता तो इसका फुटेज पुलिस अफसरों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती और हंगामा करने वाले पहचान में आ जाते।