बलिया। भगवान को पाने के लिए भक्ति का मार्ग सबसे श्रेष्ठ मार्ग है। जो भक्ति करते है वे किसी की निंदा या वंदना कि परवाह नहीं करते है। भक्ति से उनके भीतर का अहंकार पिघल जाता है । इसके साथ ही वे सहनशील होते है। सहनशीलता भक्ति का पहला सूत्र है। यह बातें पं0 श्रीकांत जी ने टाउनहाल में आयोजित सप्ताहव्यापी संगीतमयी श्रीमद भागवत कथा में तीसरे दिन प्रवचन के दौरान कहीं।
उन्होंने कहा कि जिसके मन में करुणा है दूसरे के दु:ख को देखकर दु:खी हो जाता है , वहीं भक्ति कर सकता है। भक्ति में किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं होना चाहिए। भक्त बिना स्वार्थ के सबके हित का कार्य करते है, भक्ति सरल हृदय वाले व्यक्ति को प्राप्त होती है चतुर व्यक्ति इसे नहीं पा सकता। भगवान ने खुद कहा है- निर्मल मन जन सो मोहि पावा , मोहि कपट छल छिद्र न भावा। भगवान सरल व्यक्ति के निकट जाते है और चालाक से दूर रहते है। ज्ञान मार्ग से भी भगवान मिलते है लेकिन वह साधकों का मार्ग है। कथा के दौरान प्रह्लाद अवतार और बामन अवतार की भव्य झांकी का मंचन हुआ।